इस बार होली का त्यौहार खूब मजे से मना। मेरठ में कई जगह जाने का मन था लेकिन रंग के बाद जब सो गया तो नीद ने खूब मनमानी की । निर्मल जी के यहाँ गया । थोड़ी गप्प हुई । लेट होने का नतीजा यह हुआ कि बस कलक्ट्रेट ही जा सका । ढेर सारे नए पुराने लोग मिले न मिलने के गिले शिकवे के साथ । इस होली मिलन कि खास बात यह रही कि अधिकारी तो नए मिले और नेता पुराने । नेता वही पुराने और उनके दल नए । इस बार यह नयी बात जरूर दिखी कि साहित्य को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखा । लगा कि होली से साहित्य का जुडाव पुरानी बात हो गयी ।
जहा नहीं जा सका उन्हें इसी माध्यम से बधाई दे रहा हूँ । पुष्पेन्द्र जी , प्रमोद पाण्डेय जी , सूर्यकांत जी , के पी जी , विजयराज जी , नाराज न हों । अगली होली आप सबके नाम ही आरक्छित है । इस बार एकनया नाम और जुदा है अपने सर्किल में और वह है अमिताभ ठाकुर का । आप मेरठ में पोस्टेड है । बधाई हो आपको होली की। अपने ग्रुप एडिटर आरपी सिंह जी से तो बस दफ्तर में ही होली मिल पा रहा हूँ पिछले तीन सालों से । वह हर बार दिल्ली खिसक जाते है । बस इसी बात की गड़बड़ है । इंतजार है कि वह होली मेरठ में मनाएं और हम सब साथ साथ होली का आनंद लें ।
..... संतराम पाण्डेय
९६३९०१०१६६
Mar 21, 2011
Jan 9, 2011
अरे ! आप तो जैसे थे वैसे ही है पुष्पेन्द्र जी
आप से पिछले दिनों काफी अरसे बाद मिलना हुआ । एक बार
जब राधा गोविन्द कालेज के मैदान में मैच हो रहा था तब और
बाद में जब अतुल जी की शोक सभा में प्रेस क्लब आना हुआ ।
बात करने का वही अंदाज । चाल में वही पुरानी
मस्ती । नाहक ही लोग कहते है की पुष्पेन्द्र जी बदल गए है । बोल में वही मिठास ।
जो किसी को भी अपना बना लेती है । हाँ ! तरक्की से जुडी कुछ मजबूरिया होती है
जिसका लोग अलग मतलब निकल लेते है । मिलना जुलना कम हो जाता है लेकिन यह तो
होता ही है । वह चाहे कोई भी हो । हम जब निर्मल जी से मिलते है तो जरूर चर्चा होती है ।
अब यही देखिये हम भी तो निर्मल जी से ज्यादा नहीं मिल पाते तो इसका मतलब तो यह नहीं की हम दूर हो
गए । हम लोगों में आज भी वही दो दसक पुरानी गर्मजोशी बनी है ।ईश्वर से
यही गुजारिश है कि हम लोगों में यही मोहब्बत बनी रहे और हम लोगों का साथ भी
बना रहे । क्यों हम ठीक कह रहे हैं न ।
जब राधा गोविन्द कालेज के मैदान में मैच हो रहा था तब और
बाद में जब अतुल जी की शोक सभा में प्रेस क्लब आना हुआ ।
बात करने का वही अंदाज । चाल में वही पुरानी
मस्ती । नाहक ही लोग कहते है की पुष्पेन्द्र जी बदल गए है । बोल में वही मिठास ।
जो किसी को भी अपना बना लेती है । हाँ ! तरक्की से जुडी कुछ मजबूरिया होती है
जिसका लोग अलग मतलब निकल लेते है । मिलना जुलना कम हो जाता है लेकिन यह तो
होता ही है । वह चाहे कोई भी हो । हम जब निर्मल जी से मिलते है तो जरूर चर्चा होती है ।
अब यही देखिये हम भी तो निर्मल जी से ज्यादा नहीं मिल पाते तो इसका मतलब तो यह नहीं की हम दूर हो
गए । हम लोगों में आज भी वही दो दसक पुरानी गर्मजोशी बनी है ।ईश्वर से
यही गुजारिश है कि हम लोगों में यही मोहब्बत बनी रहे और हम लोगों का साथ भी
बना रहे । क्यों हम ठीक कह रहे हैं न ।
Jan 4, 2011
न खोएं रिश्तों का आधार
आज जो कुछ कहने का मन हो रहा है उसे डा कुअंर बेचैन की दो पंक्तियों ने और कुरेद दिया । वह कहते हैं -
कौन किसका साथ देता है
कौन गिरते को हाथ देता है
तुम गर चाहो तो देख लो गिरकर
दोस्त पीछे से लात देता है ।
आज गिरते रिश्तों को देख कर यकीन नहीं होता कि यह वही देश है जो वसुधैव
कुटुम्बकम को आत्मसात किये है । समाज से अपनापन रोज बेदखल होता जा
रहा है । हम दिलो दिमाग से इसे ख़ारिज करने पर तुले हैं । एक कवी ने ठीक
ही कहा है -
रिश्तों की कैसी उलझन है
शर्तों पर होते बंधन हैं
अब बंध जाने का मोह नहीं
बस खुल जाने की तड़पन है ।
बस एक बात कहनी है कि जब रिश्ते बोझ बन जाएँ तो उसे ऐसे उठायें कि जिंदगी
हलकी हो जाये । उसे बोझ न बने रहने दें ।
कौन किसका साथ देता है
कौन गिरते को हाथ देता है
तुम गर चाहो तो देख लो गिरकर
दोस्त पीछे से लात देता है ।
आज गिरते रिश्तों को देख कर यकीन नहीं होता कि यह वही देश है जो वसुधैव
कुटुम्बकम को आत्मसात किये है । समाज से अपनापन रोज बेदखल होता जा
रहा है । हम दिलो दिमाग से इसे ख़ारिज करने पर तुले हैं । एक कवी ने ठीक
ही कहा है -
रिश्तों की कैसी उलझन है
शर्तों पर होते बंधन हैं
अब बंध जाने का मोह नहीं
बस खुल जाने की तड़पन है ।
बस एक बात कहनी है कि जब रिश्ते बोझ बन जाएँ तो उसे ऐसे उठायें कि जिंदगी
हलकी हो जाये । उसे बोझ न बने रहने दें ।
Sep 19, 2010
हमले का मकसद क्या है
रविवार को दिल्ली की जमा मस्जिद के पास विदेशी सैलानियों पर हुआ हमला नजरंदाज नहीं किया जा सकता । रास्ट्र मंडल खेल अभी होने ही है । विदेशी भारत न आयें उन्हें रोकने की साजिश भी हो सकती है । अब तो दिल्ली पोलिसे को सचेत हो ही जाना चाहिए । हमले के पीछे जो लोग भी हो उन्हें हर हल में पकड़ा जाना चाहिए ।
Sep 11, 2010
आज की बात
अब पंचायत चुनाव की तैयारी धूमधाम से शुरू हो गयी है । लोगों की तैयारियों में शराब से लेकर न जाने क्या क्या शामिल है । कुछ लोगों के मजे आ रहे हैं तो कुछ को लगता है की फंस गए हैं । चुनाव में कमाई हुई तो मजे नहीं तो यह चुनाव भी सजा बन जायेगा । खबरें छन छन के आ रही हैं । कई किस्म के लोग ऐसे भी हैं जो इन खबरों पर नजर रखे हैं कि जैसे भी हो चुनाव फायदे का ही होना चाहिए । कोई भी जीते अपुन का क्या ? अपुन क़ी तो जेब ही भारी हो जाये तो यही जीत है । अब तो लगता है कि चुनाव में चाहे नेता भले हर जाय लेकिन इस किस्म के लोग तो हर चुनाव में जीत ही जाते हैं ।
Sep 11, 2009
Aug 8, 2009
Jul 30, 2009
Jul 23, 2009
Jul 19, 2009
Jul 10, 2009
Jul 9, 2009
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