मौसम का मिजाज: एक व्यंग्य
-संतराम पाण्डेय-
मौसम के मिजाज के क्या कहने, यह बूझो तो जानें जैसी पहेली से कम नहीं है। हमारे देश में मौसम अब सिर्फ मौसम नहीं रहा, वह एक संवेदनशील सेलिब्रिटी बन चुका है, जिसका मूड हर घंटे बदलता रहता है। पहले लोग घर से निकलने से पहले आसमान देखकर अंदाजा लगा लेते थे कि आज छाता ले जाना है या नहीं। अब हालत यह है कि आदमी छाता, स्वेटर, टोपी, पानी की बोतल और धूप का चश्मा- सब साथ लेकर निकलता है, क्योंकि मौसम कब क्या बन जाए, इसका भरोसा नहीं।
पहले मौसम का एक चरित्र हुआ करता था। गर्मी आती थी तो पूरे आत्मविश्वास से आती थी। सर्दी का अपना रुतबा था और बरसात का अपना रोमांस लेकिन अब मौसम ने गठबंधन सरकार की तरह व्यवहार शुरू कर दिया है। सुबह सर्दी, दोपहर में गर्मी और शाम को बारिश। आदमी समझ ही नहीं पाता कि शरीर पर स्वेटर रखे या आत्मा पर धैर्य।
मौसम विभाग की हालत भी किसी टीवी चौनल के एंकर जैसी हो गई है। वे पूरे आत्मविश्वास से बताते हैं- अगले चौबीस घंटों में कहीं-कहीं हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है। अब कहीं-कहीं कहाँ है, यह कोई नहीं जानता। कई बार तो बारिश मौसम विभाग के दफ्तर के सामने भी नहीं होती लेकिन घोषणा इतनी गंभीरता से होती है कि लगता है बादलों के साथ उनकी सीधी मीटिंग हुई हो।
गाँव के पुराने बुजुर्ग मौसम विज्ञान के चलते-फिरते विश्वविद्यालय हुआ करते थे। वे चींटियों की लाइन देखकर बता देते थे कि बारिश आने वाली है। अब नई पीढ़ी मोबाइल ऐप देखकर भी कन्फ्यूज रहती है। ऐप में चमकता सूरज दिखाई देता है और बाहर सड़क पर लोग नाव चलाने की तैयारी कर रहे होते हैं। तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है कि आदमी चाँद पर पहुँच गया, लेकिन यह अब भी तय नहीं कर पाया कि शाम को कपड़े बाहर सुखाने चाहिए या नहीं।
सबसे दुखद स्थिति मध्यम वर्ग की है। उसने गर्मी आते ही कूलर ठीक करवाया, तभी बारिश शुरू हो गई। सर्दी के कपड़े धुलवाकर रखे ही थे कि अचानक ठंड लौट आई। बेचारा हर मौसम में सिर्फ खर्चा ही खर्चा देखता है। ऊपर से बिजली विभाग भी मौसम का सगा भाई लगता है। जैसे ही गर्मी बढ़ती है, बिजली चली जाती है, ताकि आदमी प्रकृति के और करीब आ सके।
बरसात का भी अब पुराना आकर्षण नहीं रहा। पहले लोग बारिश में भीगकर कविता लिखते थे, पकौड़े खाते थे और फिल्मी गाने गाते थे। अब बारिश होते ही सबसे पहले मोबाइल बचाया जाता है। फिर ट्रैफिक जाम में फँसकर आदमी यही सोचता है कि आखिर उसने घर से निकलने की गलती क्यों की। शहरों की सड़कें थोड़ी बारिश में ही ऐसी भर जाती हैं, मानो नगर निगम ने सड़क नहीं, तालाब निर्माण योजना चलाई हो।
बच्चों के लिए मौसम का मतलब सिर्फ स्कूल बंद होना है। गर्मी ज्यादा हो तो छुट्टी, बारिश ज्यादा हो तो छुट्टी, ठंड ज्यादा हो तो छुट्टी। बच्चे मौसम परिवर्तन को पर्यावरण संकट नहीं, अवसर के रूप में देखते हैं। दूसरी ओर ऑफिस जाने वालों के लिए हर मौसम एक सजा है। गर्मी में पसीना, बारिश में जाम और सर्दी में रजाई छोड़ने का दुख। अब तो ऐसा लगता है कि मौसम ने इंसानों से राजनीति सीख ली है। कब पलटी मारनी है, कब गरजना है और कब बिना बरसे निकल जाना है - इसमें मौसम पूरी तरह माहिर हो चुका है। आदमी बेचारा हर सुबह आसमान की तरफ उसी उम्मीद से देखता है, जैसे जनता चुनावी घोषणापत्र को देखती है।
कुल मिलाकर, मौसम अब प्रकृति का हिस्सा कम और मनोरंजन उद्योग का हिस्सा ज्यादा लगने लगा है। हर दिन नया ट्विस्ट, नया ड्रामा और नया सरप्राइज। फर्क सिर्फ इतना है कि इस शो का रिमोट किसी इंसान के हाथ में नहीं है।


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