Oct 3, 2018


व्यंग्य तो हम १९८९ से लिख रहे हैं। मेरठ के अति लोकप्रिय दैनिक प्रभात में 'तिरछी नजरÓ के रोजाना के स्तंभ में हजारों व्यंग्य छपे। सभी की कतरन तो नहीं है लेकिन कुछ हैं जिनको यहां दे रहे हैं।
सहृदय पाठकों व मित्रों आप भी देखिए.....


व्यंग्य
०१. रिश्तों में अंग्रेजियत
-संतराम पाण्डेय-
 हमारे यहां रिश्ते बहुत हैं। उनको कहने के अलग अलग नाम हैं। माता, पिता, दादा, दादी, चाचा, चाची, ताऊ, ताई, बुआ, फूफा, भाई, बहन, भतीजा, भतीजी, नाना, नानी, मामा, मामी,  भैया, भाभी, सास, ससुर, देवर, देवरानी, ननद, नंदोई, साला, साली, सलहज और बहुत सारे। रिश्ते अनंत है। इन सबको सम्बोधित करने में जो भारतीयता और आत्मीयता झलकती है, वह कुछ और कहकर संबोधित करने में कहां। अब आज की पीढ़ी के पास वक्त की कमी है और रिश्तों को याद करने का झंझट भी। आज रिश्तों पर अंग्रेजियत हॉवी है।
अंग्रेज दूर दृष्टि वाले थे। हमारी समस्या वह समझते  रहे होंगे। इससे निपटने के लिए देश की नई पीढ़ी को कॉमन नाम दे गए। सबको अंकल कहो। इसमें जो फिट न बैठे और कुछ न सूझे तो सर कहकर निपटाया जा सकता है। बहुत बड़ी समस्या अंग्रेजों ने हल कर दी। नहीं तो आज की पीढ़ी बड़े धर्म संकट में फंसी होती।
अब यही देखिये, जब लड़के लड़कियां किसी के पीछे सर, सर या मैडम, मैडम कहते फिरते हैं तो सहज ही न सर की शिनाख्त हो पाती है ना मैडम की और नई पीढ़ी तो अपनी शिनाख्त के लिए भटक ही रही है। यकीन मानिए, मैडम मैडम की रट से जब कोई मैडम झल्ला जाती हैं तो यही कहती हैं-क्या मैडम मैडम लगा रखा है। इस पर नई पीढ़ी के लड़के लड़कियां तुरंत पैतरा बदल लेते है। फिर  वह मैडम से मेम पर आ जाते हैं। प्लीज मेम....। मेम सुनते ही मैडम भी नरम पड़ जाती हैं।
जमाना रिश्तों के मामले में बहुत घन चक्कर हो गया है। न यकीन हो तो किसी आंटी को चाची या किसी अंकल को चाचा कह कर बुला लो। मौका मिला तो वह कान के नीचे गरम करने से नहीं चूकेंगे। अंकल, आंटी, मैडम, मैम, सर से गूंजती भारत की धरा गौरवान्वित होती दिखती है और मुख मंड़ल ऐसे दमक उठता है मानो कोई उपहार मिल गया हो। सच मानिए बिर्तानियो ने बड़ा उपकार किया नहीं तो आज की नई पीढ़ी कहीं मुँह दिखाने लायक न रहती। मैडमें और सर तो शर्म के मारे घर से निकलने से बचते कि न जाने बाहर कौन चाचा- चाची कहने को तैयार बैठा हो।
नई पीढ़ी के पास समस्या भी तो है। अब किसी दफ्तर में अधिकारी या क्लर्क को श्रीमान जी वह कह भी लें तो किसी महिला कर्मचारी को श्रीमती जी तो नहीं कह सकते न। कुछ लोगों पर संबोधन के मामले में भूत सवार है। सर या मैडम कह लो तो चलेगा लेकिन चाचा या चाची तो कोई सुनने को भी तैयार नहीं। भाई साहब  कहने पर भी कुछ लोग भड़क जाते हैं। किसी और देश में चले जाइए तो वहां भी समस्या खड़ी दिखाई देती है। मैम, मैडम  या सर कहो तो लोग रुक कर बात सुन भी लेंगे। वहां श्रीमान जी या चाची जी कौन सुनने वाला है। लगता है कि रिश्तें के मामले में अंग्रेज बहुत समझदार थे। उन्होनें ज्यादा लफड़ा पाला ही नहीं। एक दो शब्द में पूरा देश निपटा लेने में वह माहिर रहे।
हमारे कस्बे के सरेखचंद सर या मैडम से बहुत कुढ़ते हैं। उनके सामने किसी को मैडम या मैम कोई कह देता है तो मुंह बना के कहते हैं देखों क्या बकरी की तरह में-में कर रहा है। कोई उनको चाचा या ताऊ कह दे तो बैठा कर चाय भी पिलाते हैं। रिश्तों के मामले में वह अंग्रेजियत के सख्त खिलाफ है। कहते हैं कि हमारे देश को अंग्रेजो और अग्रेजियत ने मारा बाकी किसी में कहां दम था। लेकिन कोई उनकी सुने तब न।




०२. कोई हमको भी पेंशन दिला दे.....
-संतराम पाण्डेय-
आज निरहू बहुत खुश था। वह जोर-जोर से गा रहा था- कोई हमको भी पेंशन दिला दे तो फिर मेरी चाल देख ले। जबसे मास्साब लोगों ने पेंशन को लेकर हाय-हुल्ला किया है, निरहू को उम्मीद बंध गई हैं पेंशन की। इसीलिए वह आज मन से गा रहा था अपने मन का गीत। उसकी भौंडी ऊंची आवाज जब सरेख चंद के कानों तक पहुंची तो वह घर से बाहर निकले और निरहू को डपट लिए- अरे बौराय गया है का निरहुआ। ई का हो- हल्ला मचा रखा है। यह सुन निरहुआ सन्न रह गया और चुप लगा गया लेकिन अगले ही पल एक सवाल दाग दिया। का साब, का हमैं पेंशन न मिली। गोरमेंट तो पेंशन देती है न।
सरेख चंद को लोग ऐसे ही सरेख नहीं कहते थे। वह बहुत पहुंचे हुए थे। हर बात की तह तक जाते थे। सरकार के पास उनकी सैकडों चिटिठयां महीने में जाया करती थीं। बोले- निरहुआ, तू बड़ा भोला है। हमै और तुम्हैं कौन पेंशन दे रही है सरकार। हम जिंदगी भर अपने काम में खटते रहैं बस। जब तक जान है, लगे रहो। भूल जा पेंशन। पेंशन लेनी है तो पहले स्कीम में पैसा जमा करो, फिर सोचो।
निरहू हैरान। बोला- साब का हम सरकार के आदमी नहीं हैं? हम खेत, खलिहान और फैक्ट्री में काम नहीं करते हैं? साठ साल बाद तो हमहू का आराम चाही।
न न न निरहू। हम तो पेंशन के ही खिलाफ हैं। देश में सवा सौ करोड से ज्यादा हम जिंदगी भर खटते हैं और  हमें कोई पेंशन नहीं मिलती। आखिर हमें भी तो बुढ़ापा आता है। हम भी तो देश की सेवा करते हैं। अन्न उगाते हैं। देश की जनता के लिए खेतों में सब्जी उगाते हैं। जब शरीर में जान नहीं रहेगी तो सब बंद। पेंशन दो तो सबको दो, नहीं तो बंद करो इसे- हम तो यही कहते हैं।
निरहू की समझ में आ रहा है कुछ मुटठी भर सरकारी विभागों में काम करने वालों और नेताओं को तों पेंशन मिल जाती है और हमारी मेहनत का कोई मोल ही नहीं? बोला- तौ का हमैं पेंशन न मिली?
हम यही तो कहते हैं कि पेंशन खत्म करो। जो पैसा बचे देश के विकास में लगाओ, सरेखचंद ने कहा। पेंशन नाकारा बना देती है। घर बैठे बिना कुछ किए महीने में मिल जाती है रकम। तो कोई काम क्यों करेगा। रिटायर हो गए तो हो गए। ये कोई बात है। क्या देश के किसान को और मजदूर को रिटायर होने का हक नहीं है लेकिन वह रिटायर हो जाए तो खाएगा क्या।
सरेख चंद की बात निरहू को कुछ-कुछ समझ में आ रही थी कि उसें कोई पेंशन मिलने वाली नहीं है। उसे रिटायर हेने का भी हक नहीं है। यह तो केवल सरकारी नौकरी वाले लोगों को ही मिलती है। यह तो भेदभाव है। क्या हम किसान और खेतों में मजदूरी करने वाले देश की सेवा नहीं कर रहे? निरहू बोला- साब चलो, हम भी सरकार के पास चलेंगे। कहेंगे कि हमहू को पेंशन दो। हम भी रिटायर होंगे।
वह अब भी गाए जा रहा था। कोई हमको भी पेंशन दिला दे तो फिॅर मेरी चाल देख लें।



०३.  व्यंग्य.....
आओ! बैठे ठाले का कारोबार करें
बैठे ठाले के अवसर हमारे यहाँ खूब है। पढ़ा लिखा हो या गैर पढ़ा। यह अवसर जबसे मिलना शुरू हुआ, बेरोजगारी भी पानी भरने लगी। ऑनलाइन का कारोबार है ही ऐसा। बस मुआ एक फ़ोन ही चाहिए टच वाला। जिसकी उंगलियां जितनी ज्यादा चलेंगी, वह उतना ही सफल है। टकाटक उंगलियां चलती है तो टचटचा के कारोबार में नित्य करंट आता चला जाता है। सफलता की २४ कैरेट की गारंटी ली जा सकती है।
पड़ोसी को देख पड़ोसी भी रंग बदलता है। पड़ोसी को देख मेरा भी मन मयूर नाच उठा। पड़ोसी के पास चला गया सलाह लेने। पड़ोसी ने जो बताया, वह हैरान करने वाला था। मैं अपने आप को कोस रहा था कि यह सब नाचीज सी बात मेरी बुद्धि में क्यों न आई। इसमें सस्पेंस है, इमोशन है, मार्के की गोपनीयता है, पारदर्शिता तो शत प्रतिशत है। सबसे बड़ी बात कि इसमें अपनी पूंजी नाम मात्र को भी नहीं लगती। कुछ डूबने का खतरा कतई नहीं।  पड़ोसी ने जब यह कहा कि इस ऑनलाइन के कारोबार में अपना क्या जाता है। ज्यादा से ज्यादा लोग यही कहेंगे न कि चला था कारोबार करने कुछ कमा नहीं पाया। यह तो किसी भी काम  में कहने वाले हजार हैें। लोगों का काम है कहना। यह तो हमें देखना है कि हमने गंवाया क्या? और इसमें गंवाने के लिए कुछ है ही नहीं।
किसी का भी बिल जमा करना हो, तो आप तुरंत कर सकते हैं। जो लाइन में लगने से घबराता है, वह ऑनलाइन के लिए चक्कर मारता रहता है। एक बार आ गया तो समझो वह दादा बाबा तक के लिए तुम्हारा ग्राहक बन गया। पेटीएम को तमाम कंपनियों ने लांच किया हुआ है। ज्यादा इस्तेमाल करने के चक्कर में वह कैश बैक देने में लगी रहती हैं। यानि कि हर्रे लगे न फिटकरी और रंग चोखा इस कारोबार में पक्का है।
कुल मिलाकर एक इंटरनेट कनेक्शन और एक टच वाला फोने ही तो चाहिए। तमाम कंपनियां टच वाला फोन लिए घूम रही हैं, किसी को पकड़ लो सस्ते में। इंटरनेट के लिए सेवा देने के लिए प्रदाता कंपनियों की भरमार है। जियो ने तो बहुत ही आसान कर दिया है। इसका एक कनेक्शन लेकर जियो और दुबारा रिचार्ज कराना ही भूल जाओ। यानि की कई महीने तक चलता है। कोई बिल जमा करने के लिए टोकने वाला नहीं। अपने घर बैठकर अपनी मर्जी के टाइमटेबल तय करके यह कारोबार करने की आजादी है सो अलग। भाग दौड से आजकल जितना बचा जाए, सेहत के लिए उतने ही फायदेमंद है। जगह-जगह जाम में फंसने का कोई चांस नहीं। सड़क चलते कोई टक्कर मार जाएगा, इसका खतरा तो दूर-दूर तक नहीं है।
इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि आप घर बैठे देश ही नहीं विदेश में बैठे किसी ग्राहक का काम कर सकते हैं। पड़ोसी का लड़का विदेश में रहता है तो यह आपके लिए फायदेमंद हो सकता है। पेटीएम से वह आपके पास पैँसे भेजे और आप पड़ोसी को घर बैठे ट्रांसफर कर दें। अपना कमीशन अपनी मर्जी से तय कर सकते हैं।
ऑन लाइन कारोबार में खाली बैठने के वक्त के बेहतर इस्तेमाल की सबसे बड़ी गुंजाइश है। सोशल मीडिया में सक्रिय होकर देश विदेश में अपना फैं्रड सर्किल मजबूत किया जा सकता है। हमारे देश में जुगाड की बड़ी अहमियत है। जुगाड़ से काम करना आना सबसे बड़ी कला है। तमाम पढ़े लिखे घूमते रह जाते हैं और जुगाड़ी बाजी मार ले जाता है। जुगाड़ से घर के तमाम काम मुफ्त में कर सकते हैं। बाजार से सामान लाने के लिए बाजार जाने की जरूरत नहीं। ऑनलाइन ऑर्डर करो, २४ घंटे के अंदर सामान लेकर कोई न कोई हाजिर। अब इस बैठे ठाले के कारोबार का कितना गुण गान करें। सरकार तो इस पर पूरी तरह फिदा है। इसका लाभ उठाने में जो चूक गया, समझों उसकी किस्मत ही खराब है। अवसर ही अवसर हैं, बस उसका लाभ उठाने की कला आनी चाहिए।
                            - लेखक व्यंग्यकार है।



०४. बाथरूम संस्कृति
०८.०९.१९९१
एक दिन जिले के बड़े अधिकारी से मिलने का मन हुआ। उनके आवास पर पहुंचा तो पता लगा साब बाथरूम में हैं। दो घंटे प्रतीक्षा करें वापस आ गया। साब बाथरूम से नहीं निकले। बाद में कब निकले, निकले भी या नहीं पता नहीं। इस वाक्या के बाद मेरी उत्सुकता बढ़ गयी कि वह कैसा बाथरूम होता होगा, जहां साब या उन जैसा व्यक्ति दो दो घंटे बैठा रहता होगा।
मैंने सुना भी है और देखा भी है कि लोग अखबार लेकर बाथरूमों में घुस जाया करते हैं। १० मिनट की जगह १५ मिनट या २० मिनट खर्च कर लेते हैं। यह बात तो समझ में नहीं आती। क्या पदन-पाठन का सर्वोत्तम स्थल बाथरूम ही है? यदि हां तो बच्चों के लिए रीडिंग रूम या बाचनालय के बजाय एक अदद बाथरूम बनवाना ही सर्वोत्तम रहेगा।
पेशे से पत्रकार, सोच से बेहद बेढंगे मुझ जैसे व्यक्ति में कई खामियां हैं। कोई काम सुनकर करने या लिखने के बताय उसकी गहराई में जाकर कागज पर उतारने में ही विश्वास करता हूं। इसलिए जब तक स्वयं बाथरूम की रीडिंग का अनुभव और वहां की ग्राह्य क्षमता का प्रयोग स्वयं पर न कर लूंगा, तब तक अपनी औलादों को भी बाथरूम में ऐसे काम करने की सलाह नहीं दूंगा। मेरे सामने समस्या यह है कि किराये का मकान है। बाथरूम भी कम्बाइंड है। अन्दर १० मिनट भी लग गया तो बाहर से दउरवाजे पर धक्का मुक्की शुरू हो जाती है।
मेरी बात का आप अन्यथा न लें। भारत के ९० प्रतिशत नागरिक मेरी ही श्रेणी में होंगे, जिनके पास अपना बाथरूम नहीं होगा। इसलिए बाथरूम की ग्राह्य क्षमता का पता लगाने के लिए सर्व प्रथम एक अदद सेप्रेट बाथरूम चाहिए। अब कभी किराए का मकान लेना पड़ा तो मकान मालिक से शर्त रख दूंगा कि कमरे का आकार छोटा भले ही हो किन्तु बाथरूम सर्वथा अलग हो जो एकांत, शान्त व एकाकीपन का पर्याय सा हो।
सरकार द्वारा बनवाये गये सुलभ शौचालयों पर यह प्रयोग करना भी चाहा किन्तु वहां ऐसे अवसर सुलभ नहीं हैं। जहां तक देश में आवास उपलब्ध कराने की चल रही योजनाओं का सवाल है, तो वह भी बेडरूम सर्वथा अलग देती ही है, किन्तु सेप्रेट बाथरूम देने के प्रति गंभीर नहीं है। सो आवासीय योजनाओं में भी एक खास तबदीली यह होनी ही चाहिए कि किचन, स्टोर और बेडरूम के साथ बाथरूम भी अलग देने की शर्त अनिवार्य कर दे।
वैसे इसकी गहराई में जाने पर बाथरूम का चक्कर एक टैक्टिस ही नजर आयी। साहब बेडरूम में खर्राटे ले रहे हों। नहीं बताया जा सकता। किसी गोपनीय बैठक में भाग ले रहे हों, पत्रकारों के कान खमखां खड़े हो जायेंगे। मित्र के साथ बाजार गये हों तो पब्लिक के आदमी को बताना वाजिब नहीं लगता। सो साहब बाथरूम में हैं- बहाना अच्छा है। पर कब तक। एक समय सीमा तो होनी ही चाहिए।
एक बात और। अधिकारी व्यस्त ज्यादा रहता है। कंहीं एकांत नहीं मिलता। इसलिए बाथरूम में अच्छा एकांत स्थल उपलब्ध ही नहीं हो सकता। फिर भी जहां तक बाथरूम की उपयोगिता का प्रश्न है-इतना तो मैंने भी सुना है कि ज्ञान या तो शमशान में मिलता है या बाथरूम में।
आर्केमिडीज को घनत्व के सिद्धान्त का ज्ञान जब बाथटब में हुआ था तब वह नंगे ही यूरेका यूरेका चिल्लाते हुए सड़क पर भाग निकले थे। अब तक यह तो पता चल ही चुका है कि बड़े अधिकारियों के सरकारी आवास में एक अदद बाथरूम भी हुआ करता है पर अभी तक ऐसी कोई सूचना नहीं मिली है कि कहीं कोई अधिकारी किसी नए प्रशासनिक तंत्र का सूत्र खोज लेने के बाद बाथरूम से नंगा निकल भागा हो।
जब तक ऐसी कोई घटना नहीं होगी, अधिकारियों की बाथरूम संस्कृति एक पहेली बनकर लेखन का विषय बनती रहेगी।


०५. अज्ञानियों की बहस
३.०५.१९९२
मेरे लिए यह तय करना कठिन हो रहा है कि बहस की स्वस्थ परम्परा कब से चली। आमतौर पर माना जाता है कि जिस विषय में जानकारी कम हो, उस पर बहस करने से ढेर सारी जानकारिया मुफ्त में मिल जाती है। बहस की किस्म का निर्धारण करें तो पता चलता है कि ये दो प्रकार की होती है। स्वस्थ व अस्वस्थ। स्वस्थ बहस में बहस करने वाले दोनों पक्षों को लाभ होता है। यही नहीं इस प्रकार की बहस जो सुनता है, उसका भी ज्ञानवद्र्धन होता है। इसे प्राचीन काल से लोग करते आ रहे हैं। दूसरी है अस्वस्थ बहस। इसमें किसी पक्ष को लाभ मिलने का मुद्दा गौण हो जाता है। मुख्य मुद्दा बहस होती है। इसके लिए किसी खास विषय की भी जरूरत नहीं होनी। इन्स्ट्रमेंट के नाम पर दो-तीन लोग चाहिए होते हैं। जहां ये लोग मिल जाते हैं, वहीं बहस शुरू कर दी जाती है।
माना जाता है कि अस्वस्थ बहस का मुख्य कारण अल्प ज्ञान होता है। जिस विषय में जितनी कम जानकारी होगी, उसकी बहस उतनी ही जानदार होगी। इसमें केवल बहस करने वाले को लाभ मिलता है। उसका ज्ञानवद्र्धन होता है हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा। इसमें ध्यान रखना पड़ता है कि आसपास कोई साहित्यकार, पत्रकार निर्विकार रूप से साकार मौजूद हो। इनकी उपस्थिति से रंग चोखा हो जाता है। बहस की इस कौम को अल्पज्ञानी बुद्धिजीवी की श्रेणी में मानने लगे हैं। इस कौम से यदि अस्वस्थ बहस छेडऩे में आप समर्थ हो गये तो समझ जीजिए कि अल्पज्ञान का सम्पूर्ण दरिया बहता नजर आयेगा।
स्वस्थ बहस तो अब रही नहीं। उस पर बहस करना ही व्यर्थ है। अस्वस्थ बहस के लिए किसी मंच की जरूरत नहीं होती। यह कहीं भी की जा सकती है। आफिस, चाय की दुकान, पान का खोखा, चौराहा, किसी पड़ोस का ड्राइंग रूम आदि इसके लिए उपयुक्त स्थल हैं। अब तक हुई बहसों से यह नतीजा सामने आया है कि यदि दो लोग बहस करते मिल जायें तो उसमें थोड़ी ही देर में ४-५ लोग शामिल हो जाते हैं। इससे ऐसा लगता है कि बहस के प्रति हमारे देश के नागरिकों में जागरूकता बढ़ी है। लगाव बढ़ा है। बहस करने वालों के लिए मुद्दे की किस्म कोई मायने नहीं रखती।
एक सर्वेक्षण से ज्ञान हुआ है कि अल्पज्ञानी बहस में रुचि ज्यादा रखते हैं। जिन्होंने कभी गांव नहीं देखा। किसानों को खेतों में काम करते नहीं देखा वह किसानों की समस्याओं पर बहस करना गौरव मानते हैं। इसमें जो सफल हो जाता है, वह स्वयं को अंग्रेजों द्वारा आजादी से पहले की जाने वाली सर नामक उपाधि से कम सम्मान का नहीं मानता।
बहस के लिए किसी औपचारिकता की भी जरूरत नहीं पड़ती। यह तो मानव का जन्म सिद्ध अधिकार है। मौखिक फ्रीस्टाइल में बेखौफ कोई भी प्रवेश कर सकता है। ज्यादा ज्ञानी के लिए बहस खतरनाक होती है। बहस का सारा मुद्दा उसी के इर्द-गिर्द घूमने लगता है। ढेर सारे अल्पज्ञानियों के अनेक भारी भरकम सवालों से जूझते रहते हैं। ज्ञानी बहस के झमेले में नहीं पड़ते। वह अल्पज्ञानियों और अज्ञानियों द्वारा फांस लिए जाते हैं। फिर उनकी स्थिति यह हो जाती है कि आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास। उनकी परेशानी तब बढ़ती है, जब बहस में- सूत न कपास, जुलाहों ने लट्ठम लट्ठा होने लगता है। कहीं-कहीं तो जूते-चप्पल चलने लगते हैं। हमारी संसद में हमारे जन प्रतिनिधि प्राय: ऐसा करते हैं। ऐसी बहस को अस्वस्थ बहस ही कहा जाता है। इसमें फंसे लोगों को उनके इष्ट मित्र बहस में भाग लेकर शंका समाधान नहीं करते वह कहते हैं-यह तो बहस थी। इसे इतना सीरियसली लेने की क्या जरूरत थी और अपने मित्र को बहस से छुड़ा कर ले जाता है।
बहस करना एक परम्परा है। खासकर हमारे देश में चुनाव प्रणाली हो या शिक्षा महंगाई यचा या वेतन भत्ता। महापालिका का मेयर हो या भ्रष्टाचार। रिश्वत खोरी हो या अपराध। हत्याएं हो या अपहरण। आइये हम भी बहस करें और एक दूसरे का हाजमा ठीक करें।


०६. एक जुगाडू देश
०८.०४.१९९१
जितनी जुगाड़ भारत में लगाई जाती है दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं लगती। हर काम के पीछे एक जुगाड़। रोटी की जुगाड़ से लेकर चिता जलाने की जुगाड़ तक पूरी जिन्दगी जुगाड़ों से भरी पड़ी है।
आपके पास कोई इम्पोटेंट सामान है। उसका कोई पुर्जा खराब हो गया। आप दुकान पर ले जाइये। दुकानदार देखते ही बोलेगा-'साब ओरीजिनल तो नहीं मिलेगा, पर ऐसी जुगाड़ कर दूंगा कि ओरीजिनल से भी अच्छा चलने लगेगा। आप मान जाते हैं और जुगाड़ शुरू हो जाती है।
मेरे एक मित्र के बच्चों ने हाई स्कूल की परीक्षा दी थी। नंबर कुछ कम आए। मित्र सीधे हमारे पास आए और बोले-बॉस, बोर्ड में कोई जुगाड़ है? लड़के के नंबर बढ़वाने हैं। मैं हतप्रभ सा उसका मुंह देखने लगा। सोचने लगा ये जुगाड़ हमारे समय में क्यों नहीं थी। हम भी बिना पढ़े जुगाड़ से पास हो सकते थे। यही सोचते-सोचते आंख लग गई।
सुबह उइते ही हमारे पड़ौसी आ धमके। आदरणीय भाभी जी ने अत्यन्त सुरीले स्वर में हमसे निवेदन किया भाई साहब, बिटिया को सोफिया में एडमिशन दिलवाना है, कोई जुगाड़ है? रात को एक जुगाड़ से फुर्सत मिली थी कि सुबह फिर जुगाड़ ने आ घेरा। सच हम जुगाड़ों में जीते हैं। पूरा देश जुगाड़ी है। यह हर काम का एक राष्ट्रीय विकल्प है। किसी अदने से लेकर महत्वपूर्ण व्यक्ति की हत्या कराने से घपलो, घोटाला को उजागर करने और दबाने में जुगाड़ों का ही उपयोग किया जाता है। जिसके पास जुगाड़ करने कराने का जुगाड़ नहीं है- वह आज की भौतिक संस्कृति में पीछे रह जायेगा।
भगवान कृष्ण ने कहा था-अहम् ब्रह्मास्मि। शायद उस समय जुगाड़ों का अस्तित्व नहीं था-अन्यता वह कहते- अहम् जुगाड़ास्मि। जुगाड़ ही तो है जो हर असंभव काम को संभव बना देता है। अनबूझ पहेली को हल कर देता है। हर समस्या जुगाड़ से हल हो सकती है और हर समस्या जुगाड़ से खड़ी की जा सकती है।
बेटे की नौकरी और बिटिया का वर जुगाड़ से ही मिलना सम्भव है। पत्नी जी की नथ हो या दुकानदार का कर्ज। आपकी पाकेट हो या बैंक का कर्जा बिना जुगाड़ के कुछ भी सम्भव नहीं। आज कोई शक्तिमान है तो बस जुगाड़। इसीलिए इसे आज राष्ट्रीय विकल्प होने का गौरव प्राप्त है। बिना जुगाड़ के साब का चपरासी भी मुंडी नहीं हिलाता।
जुगाड़ प्रथा के जनक कौन थे इसका पता लगाने के लिए जुगाड़ लड़ानी होगी। इतना आवश्यक है कि जुगाड़ भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन चुकी है। इसके अभाव में हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि जुगाड़ ने ईश्वर को भी नहीं बक्शा। वैष्णों देवी जाईये तो दर्शन की जुगाड़ में सैंकड़ों भटकते मिलेंगे और उन भटकते हुओं को मूंडने की जुगाड़ में पुजारी मिलेंगे। कुल मिलाकर स्वर्ग प्राप्ति की जुगाड़ है ये।
वास्तव में भारत की इतनी दुर्दशा का एक बड़ा कारण यहां की जुगाड़ू मानसिकता है। राष्ट्र को दिशा दिखाने वाले अपने घर भरने की जुगाड़ में है। अपने आपको इंजीनियर्स कहने वाले रोजी रोटी की जुगाड़ में है। डाक्टर मरीज को ऐंठने की जुगाड़ में व्यस्त है। वकील अपने मुवक्किल को चूसने की जुगाड़ में लगे हैं। जुगाड़ ही सब कुछ है- पूजनीय, अर्चनीय, नमनीय।


०७.दाढ़ी-चश्मे पर 'नो कमेंटÓ
०६.०६.१९९२
हमने प्रतिबंध लगा दिया है कि हमारी दाढ़ी और चश्मे पर कोई कमेंट नहीं करेगा। आवश्यकता समझी गयी तो निकट भविष्य में लिखित सूचना प्रकाशित कर दी जायेगी। कुछ लोग इस प्रतिबंध पर टिप्पणी कर सकते हैं कि आलोचना जनता जनार्दन का मौलिक अधिकार है, उस पर प्रतिबंध कैसे लगाया जा सकता है। हमारा तर्क है कि इस जमाने में अब कुछ असम्भव नहीं रहा है। हर चीज सम्भव है। तिल का ताड़ बनाना और ताड़ का तिल बनाना कोई असम्भव काम नहीं है।
शहर की कई ऐसी चीज है जिन पर टिप्पणी अथवा आलोचना करने से शहर की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है। हम समझते हैं कि इस जद के अन्दर हमारी दाढ़ी भी आती है और चश्मा भी। ये दोनों मेरी नितान्त निजी चीजें हैं। दाढ़ी हमारी दाढ़ी पर है और चश्मा हमारी आंख पर। दूसरे किसी को इनसे सिरदर्दी क्यों। किन्तु सुनने में आया है कि हमारे कुछ प्रेमी विरोधी जन एक साजिश के तहत इस पर कब्जा करना चाहते हैं।
यह बात तो समझ में आती है कि लोग हमारी नजर को गलत तरीके से तिरछी करके मनमाफिक एंगिल से प्रभाव डलवाने की कोशिश करें किन्तु यह कतई सम्भव नहीं है कि उनके इस काम में मैं खुद व्यक्तिगत रूप से सहयोगी बनूं। इसलिए बदनामी से बचने के लिए इन दोनों व्यक्तिगत चीजों पर प्रतिबंध लगाना जरूरी समझा गया।
शहर में आजकल आलोचना का दौर चल रहा है। एक पूर्व विधायक के नेतृत्व में लोग पानी मांगने निगम गये। इस काम में विरोध करने वालों पर लोगों का गुस्सा उतरा तो लोगों ने आलोचना शुरू कर दी कि काम कराने का एक तरीका होता है। जबरन पानी थोड़ी मांगा जाता है। कैसा जमाना आ गया। पानी मांगने पर भी राजनीति। खड़ंजों पर भी राजनीति। शौचालयों पर राजनीति। हर काम में राजनीति बिना राजनीति के काम ही नहीं होता। काम और राजनीति का संबंध दिनों दिन गहराता जा रहा है। काम तो होता नहीं-आलोचनाएं पहले होने लगती है। जिसके मन में आया पानी मांगने पर भी गलत टिप्पणी कर डाली।
जहां दो आदमी होते हैं-बतियाते ही हैं। एक से ज्यादा बर्तन होंगे तो खड़केंगे ही। सो महापालिका में भी थोड़ी खडख़ड़ाहट हो गयी तो गलत क्या। ऐसे मामलों पर टिप्पणी करने से पानी भी बदनाम होता है और अधिकारी भी। इसी बदनामी से बचने के लिए हमने अपनी दोनों चीजों पर प्रतिबंध लगाने का मन बनाया।
निकट भविष्य में कुछ भी हो सकता है। काम को लेकर किसी की भी आलोचना हो सकती है। हमारे सोचने समझने का तरीका बदल गया है। नजरिया बदल गया है। हम एक मात्र उपभोक्ता ही तो है। लेकिन अपनी जरूरत के लिए किसी की आलोचना ठीक नहीं मानी जा सकती। अब तो समय यह आ गया है कि धीरे-धीरे सब बदलता जा रहा है। काम करना भी और काम करने का तरीका भी। काम करना तो पूर्णरूपेण बदल गया है। परिवर्तन की होड़ में सब कुछ बदल कर रह गया है। पहले हर काम का सीधा सा अर्थ हुआ करता था। अब किसी काम का अर्थ निकालना टेढ़ी खीर बन गया है। आदमी का काम से चोली दामन का रिश्ता है। काम है तो आदमी होगा ही और आदमी का काम से चोली दामन का रिश्ता है। काम है तो आदमी होगा ही और आदमी के बिना काम हो ही नहीं सकता। बस यदि फर्क है तो आदमी-आदमी में।
गर्मियों में पानी की अत्यन्त आवश्यकता होती है। आजकल पानी नल से नहीं बिजली से आता है। पानी के लिए नल का नहीं, बिजली का होना अनिवार्य है। बिजली हो तो बिना नल के आपके घर में पानी पहुंचाया जा सकता है, किन्तु नल और बिजली दोनों के रहते पानी न मिले तो फिर पानी मिलने के काम में दिक्कत पेश आना वाजिब है। ऐसे समय में ही उपभोक्तावादी दुनिया का प्राणी हमारा समाज गुस्सा करता है।


०८. हम होंगे कामयाब एक दिन
२७.०२.२००८
किरोरी एक छोटी सी दुकान खोल बैठा। अकेला था इसलिए उसे स्वयं दुकान पर बैठना पड़ता था। बेटा छोटा था। पत्नी दुकानदारी का लेन-देन समझती नहीं थी। उसे बच्चे की देखभाल और घर के कामों से ही फुर्सत नहीं मिलती थी। जब दुकान पर भीड़ हो जाती तो उसके हाथ-पांव फूल जाते। कई ग्राहकों से तो वह पैसे लेने ही भूल जाता। जब शाम को हिसाब करता तो १००-५० कम ही मिलते। घाटा इसलिए भी होता था कि वह जिस भाव में थोक से सामान लाता था, उसी भाव में बेच देता था। उसके यार दोस्त, खुद पत्नी उसे समझाती कि किस बवाल में फंंस गये पहले की सूखी दो रोटी ही भली थी। इतनी चकचक तो न थी। किरोरी समझाता तसल्ली रखे। कामयाबी मिलेगी। धीरे-धीरे समय बदलता गया। उसका काम बढ़ा। दुकानदारी के गुण उसे आ गये। अब एक नौकर भी रख लिया। बेटा बड़ा हो गया। पत्नी भी हिसाब-किताब रखना समझ गयी। अब वह किरोरी नहीं-करोड़ी मल हो गया है। जो लोग किरोरी व उसकी दुकान को देखकर हंसते थे, उन्हें देख कर अब करोड़ी हंसता है और कहता है हम कहते थे न हम होंगे कामयाब एक दिन।
करमचंद की कचहरी में नौकरी लगी तो उसे लगा कि उसके करम फूट गये। थोडी सी तन्ख्वाह घर में ही खप जाती, महीने भर उसे चाय नहीं मिल पाती दिन भर जेब में पैसे न हों तो चाय काहे की पिये। इसको तो कई लोगों ने सलाह दी कि कचहरी की नौकरी छोड़ दूध की डेरी कर ले। कम से कम दो किलो दूध को तीन किलो बनाकर बेचेगा तो भी एक किलो का मुनाफा कहीं नहीं गया। धीरे धीरे अच्छी चल निकलेगी। दो चार साल बीते। अब वह नया नहीं रहा। शाम को घर आता है तो ऐसा लगता है कि करमचंद नौकरी से नहीं बाजार से आ रहा है। अब उसे लगने लगा कि बच्चे स्कूल में जो गाते है कि अच्छा ही गाते है, कि हम होंगे कामयाब एक दिन।
गौरव बचपन से ही बड़ा होनहार था। वह जिस काम में हाथ लगाता वह फौरन हो जाता। लोग उसे कहा करते थे बड़ा होनहार लड़का है। कोई कहता जादू है गौरव के हाथ में। गौरव को लगा कि अब वह जो काम करेगा उसमें ही सफलता मिलेगी। अब वह पूरे बीस साल का हो चला है। पड़ोसी परिवार में उसकी आंखे चार हो गयी हैं और वह है कि गौरव की तरफ आंख उठाकर नहीं देखती। अब उसे लगने लगा कि शायद उसमें ही कही कमी है। फिर भी वह कोशिश में लगा रहा और उसे सफलता मिली। दोनों अभी हाल ही में दाम्पत्य सूत्र में बंधे हैं। यार दोस्तों को पता है कि उसने कितने पापड़ बेले। अब वह दोस्तों को देखता है तो कहता है मैं कहता था न कि हम होंगे कामयाब एक दिन।



०९. रिक्शे का तीसरा पहिया
इस शहर में उतनी समस्या यातायात की अव्यवस्था से नहीं है जितनी रिक्शे के तीसरे पहिये से है। इस शहर का हर तीसरा नागरिक रिक्शे के पहिये से परेशान है। वह चाहे पैदल चलने वाला हो या वाहन से। बच्चा हो, बूढ़ा हो या नौजवान हो। महिला हो या पुरुष। कोई भी तो रिक्शे के तीसरे पहिए से बचा नहीं है। कवि हो या साहित्यकार, नौकरी पेशा हो अथवा कथाकार व्यवसायी हो डॉक्टर हो या पत्रकार, मजदूर हो या अमीर, हर कोई रिक्शे के तीसरे पहिये से त्रस्त है। रिक्शे के तीसरे पहिये का अजूबा यह है कि तमाम पीडि़तों पर इसका प्रभाव अलग-अलग एंगिल से पड़ते हुए भी एक सा है।
आईये, सबसे पहले हापुड़ अड्डा लिये चलते हैं। हापुड़ अड्डा में चारों तरफ को निकलने वाली सड़क में से आप किसी तरफ जाइये। जो मार्ग आपको सबसे अधिक प्रिय हो। मेरा दावा है कि रिक्शा का तीसरा पहिया आपके मार्ग में अवरोधक न बनते हुए भी आपको आगे नहीं बढऩे देगा। पता चला कि आप नन्दन सिनेमा में फिल्म देखने जा रहे हैं। घर से आधा पहले निकले हैं किन्तु में गारंटी के साथ कह सकता हूं कि आप जब सिनेमा हाल में पहुंचेंगे फिल्म कम से कम १० मिनट आगे खिसक चुकी होगी। एक बात और बता दूं। रिक्शे के तीसरे पहिए से अब तक कई बार लेट हो चुकेंगे किन्तु में पहला इन्सान हूं जो आपकी भावनाओं पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा हूं।
एक सज्जन ने डॉक्टर को फोन किया कि उसके पिताश्री की तबियत अचानक बिगड़ गयी है। फोन सुनते ही डॉक्टर साहब मारुति से चल पड़े किन्तु पवन के वेग के समान चलने वाली मारुति में सवार डॉक्टर जब तक मरीज के पास पहुंचे, बहुत देर हो चुकी थी। एक पत्रकार महोदय को पता चला कि प्रहलाद नगर के पास कहीं कुछ गड़बड़ है। पत्रकार चल पड़े किन्तु जब वह इस चौराहे पर पहुंचते हैं तो बेबश हो जाते है। रिक्शे का तीसरा पहिया आड़े आ जाता है। मौका-ए-वारदात पर पहुुचते न पहुुंचते कम से कम छायाकार का काम  समाप्त हुआ मिलता है।
एक सज्जन की श्रीमती जी भगत सिंह बाजार जा रही थीं। किसी तरह बाजार में घुस गयीं और खरीददारी कर ली, किन्तु जब सामान के साथ वह बाहर निकल कर रिक्शा पकडऩे को हुई तो रिक्शा तो मिला नहीं, रिक्शे का तीसरा पहिया सामने आ गया। एक रिक्शा उनके सामने पहुंच न सका, रिक्शे के तीन-तीन तीसरे पहिये सामने आ डटे।
आंकड़े गवाह है कि रिक्शे के तीसरे पहिये के कारण अब तक हजारों लोगों की बस छूट चुकी है। ट्रेन निकल चुकी है। दुकान पर देर से पहुंचे हैं। दफ्तर में डॉट सुननी पड़ी है।
केवल हापुड़ अड्डा ही नहीं, बेगमपुल चले जाइये, लालकुर्ती की पैंठ के सामने पुल के पास से आप आगे नहीं बढ़ सकते। घण्टाघर चले जाइये, दिल्ली रोड जाने में नाकों चने चबाने पडेंगे। बाजारों में वैली बाजार चले जाइये अथवा खैरनगर, एक सा माहौल मिलेगा।
दर असल होता यह है कि जल्दी निकलने के चक्कर में रिक्शा चालक अपना रिक्शा निकालने के प्रयास में रिक्शे का तीसरा पहिया घुसा देते हैं। रिक्शा निकले या न निकले, लेकिन रिक्शे के महावत का अनुमान होता है कि यदि तीसरा पहिया सेट हो गया तो रिक्शे को निकलने से भगवान भी नहीं रोक सकता आप स्कूटर से जा रहे हैं। संयोग से यदि सामने रिक्शा जा रहा है तो वो कम से कम ३० फुट की दूरी बनाये रखें अन्यथा दनादन बिना हाथ दिये रिक्शा दायें-बायें लहराएगा तो आपको गिरने से शक्तिमान भी नहीं बचा सकता। आंकड़ों की तह तक यदि पुलिस जाकर बारिकी से जांच करे तो पता चलेगा कि साल भी की तमाम घटनाओं की ६० फीसद घटनाएं रिक्शे के तीसरे पहिए से होती हे। इसमें भी विशेष बात यह कि इससे रिक्शा चालकों की कोई भागीदारी नहीं होती है।

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