Jun 8, 2026

व्यंग्य: डायन वाली महंगाई बनाम देवी स्वरूप महंगाई

-संतराम पाण्डेय-


महंगाई देखकर अब लोग नहीं कहते कि उसका कोई स्टेटस नहीं है। साल 2008-09 का दौर याद कीजिए। टीवी चैनलों पर एंकर ऐसे चिल्लाते थे जैसे प्याज नहीं, जमाना 80 रुपये किलो हो गया हो। नेता मंचों से कविता पढ़ते थे — “महंगाई डायन खाय जात है!” और जनता भी पूरी श्रद्धा से मानती थी कि महंगाई सचमुच कोई चुड़ैल है, जो रसोई में घुसकर दाल, तेल और सब्ज़ी निगल जाती है।

उस समय अगर टमाटर 40 रुपये किलो हो जाता था तो अखबारों में लाल अक्षरों में छपता था— टमाटर ने बिगाड़ा रसोई का स्वाद! आज टमाटर 120 रुपये किलो हो जाए तो जनता मोबाइल निकालकर रील बनाती है — दोस्तों, आज हम बना रहे हैं ‘टमाटर दर्शन देखिए, ये वही सब्ज़ी है जो हमारे दादा खाते थे!

पहले महंगाई “डायन थी, आज विकास की सहेली है। तब गैस सिलेंडर महंगा होता था तो लोग सड़कों पर उतर आते थे। आज सिलेंडर इतना महंगा है कि लोग उसे ड्राइंग रूम में शोपीस की तरह रखते हैं और मेहमानों से कहते हैं —बच्चों को दूर रखना, इसमें हमारी आधी सैलरी भरी हैँ। पहले पेट्रोल 5 रुपये बढ़ता था तो ऐसा माहौल बनता था मानो देश में आपातकाल लग गया हो। आज पेट्रोल 100 के पार है, लेकिन जनता ने आध्यात्मिक विकास कर लिया है। अब लोग बाइक में तेल नहीं भरवाते, आस्था भरवाते हैं। मीटर देखते हैं और मन ही मन बोलते हैं —माया है, सब माया है

सबसे बड़ा बदलाव भाषा में आया है। 2009 में महंगाई जनता पर हमला थी। 2026 में वही महंगाई वैश्विक परिस्थितियों का प्रभाव बन चुकी है। यानि पहले जेब कटती थी, अब अंतरराष्ट्रीय कारणों से आर्थिक पुनर्संतुलन होता है।

पहले लोग पूछते थे —दाल इतनी महंगी क्यों है?

अब पूछते हैं —EMI भरें या किडनी बचाएं?

और जनता भी कितनी समझदार हो गई है। पहले 20 रुपये बढ़ने पर सरकार बदलने की बातें होती थीं। अब 200 रुपये बढ़ जाएं तो लोग कहते हैं—चलो, कम से कम देश का सम्मान तो बढ़ रहा है।

महंगाई अब डायन नहीं रही। अब वह भारतीय परिवार की सबसे संस्कारी बहू बन चुकी है —

हर महीने चुपचाप आती है, खर्च बढ़ाती है और जाते-जाते बचत को गायब कर देती है।

और हम?

हम भी अब अनुभवी नागरिक हैं। राशन खरीदते समय कैलकुलेटर नहीं, दिल मजबूत करके जाते हैं। सब्ज़ी वाले से भाव नहीं पूछते, पहले अपना ब्लड प्रेशर चेक करते हैं।

अंत में बस इतना ही —2009 में महंगाई डायन थी क्योंकि तब जेब में उम्मीद बची हुई थी।

महंगाई अब केवल आर्थिक समस्या नहीं रही, बल्कि आम आदमी की जिंदगी का स्थायी सदस्य बन चुकी है। पहले लोग बाजार जाते थे सामान खरीदने, अब केवल दाम देखकर लौट आने की हिम्मत जुटाने जाते हैं। सब्ज़ियों के भाव सुनकर ऐसा लगता है मानो दुकानदार आलू-प्याज़ नहीं, हीरे-जवाहरात बेच रहा हो। पेट्रोल के दाम सुनकर बाइक भी सोचती होगी कि “मालिक, आज पैदल ही चले जाओ। चाय में अब चीनी कम और चिंता ज़्यादा घुलती है। वेतन बढ़ने की खबरें केवल भाषणों में सुनाई देती हैं, जबकि खर्चे रोज़ नया रिकॉर्ड बना रहे हैं। लगता है भविष्य में दुकानों पर बोर्ड लगेगा “सामान देखकर खुश हो जाइए, खरीदना जरूरी नहीं है।

आज महंगाई पर व्यंग्य इसलिए लिखा जाता है क्योंकि अब हंसना ही सबसे सस्ता मनोरंजन बचा है। अब वह पहले जैसी शर्मीली नहीं रही, बल्कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बन गई। आज की महंगाई सीधे आदमी की जेब में हाथ डालकर कहती है भाई, UPI कर दो। कभी प्याज़ आँसू निकालता था, अब सिलेंडर, स्कूल फीस और बिजली का बिल मिलकर पूरा पारिवारिक धारावाहिक बना देते हैं। वक्त है, बदल रहा है, बदलेगा तौ है ही।

 

एफ-329, गंगानगर, मवाना रोड, मेरठ-250001 (उप्र)

संपर्क: 8218779805


 मौसम का मिजाज: एक व्यंग्य

-संतराम पाण्डेय-

मौसम के मिजाज के क्या कहने, यह बूझो तो जानें जैसी पहेली से कम नहीं है। हमारे देश में मौसम अब सिर्फ मौसम नहीं रहा, वह एक संवेदनशील सेलिब्रिटी बन चुका है, जिसका मूड हर घंटे बदलता रहता है। पहले लोग घर से निकलने से पहले आसमान देखकर अंदाजा लगा लेते थे कि आज छाता ले जाना है या नहीं। अब हालत यह है कि आदमी छाता, स्वेटर, टोपी, पानी की बोतल और धूप का चश्मा- सब साथ लेकर निकलता है, क्योंकि मौसम कब क्या बन जाए, इसका भरोसा नहीं।

पहले मौसम का एक चरित्र हुआ करता था। गर्मी आती थी तो पूरे आत्मविश्वास से आती थी। सर्दी का अपना रुतबा था और बरसात का अपना रोमांस लेकिन अब मौसम ने गठबंधन सरकार की तरह व्यवहार शुरू कर दिया है। सुबह सर्दी, दोपहर में गर्मी और शाम को बारिश। आदमी समझ ही नहीं पाता कि शरीर पर स्वेटर रखे या आत्मा पर धैर्य।

मौसम विभाग की हालत भी किसी टीवी चौनल के एंकर जैसी हो गई है। वे पूरे आत्मविश्वास से बताते हैं- अगले चौबीस घंटों में कहीं-कहीं हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है। अब कहीं-कहीं कहाँ है, यह कोई नहीं जानता। कई बार तो बारिश मौसम विभाग के दफ्तर के सामने भी नहीं होती लेकिन घोषणा इतनी गंभीरता से होती है कि लगता है बादलों के साथ उनकी सीधी मीटिंग हुई हो।

गाँव के पुराने बुजुर्ग मौसम विज्ञान के चलते-फिरते विश्वविद्यालय हुआ करते थे। वे चींटियों की लाइन देखकर बता देते थे कि बारिश आने वाली है। अब नई पीढ़ी मोबाइल ऐप देखकर भी कन्फ्यूज रहती है। ऐप में चमकता सूरज दिखाई देता है और बाहर सड़क पर लोग नाव चलाने की तैयारी कर रहे होते हैं। तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है कि आदमी चाँद पर पहुँच गया, लेकिन यह अब भी तय नहीं कर पाया कि शाम को कपड़े बाहर सुखाने चाहिए या नहीं।

सबसे दुखद स्थिति मध्यम वर्ग की है। उसने गर्मी आते ही कूलर ठीक करवाया, तभी बारिश शुरू हो गई। सर्दी के कपड़े धुलवाकर रखे ही थे कि अचानक ठंड लौट आई। बेचारा हर मौसम में सिर्फ खर्चा ही खर्चा देखता है। ऊपर से बिजली विभाग भी मौसम का सगा भाई लगता है। जैसे ही गर्मी बढ़ती है, बिजली चली जाती है, ताकि आदमी प्रकृति के और करीब आ सके।

बरसात का भी अब पुराना आकर्षण नहीं रहा। पहले लोग बारिश में भीगकर कविता लिखते थे, पकौड़े खाते थे और फिल्मी गाने गाते थे। अब बारिश होते ही सबसे पहले मोबाइल बचाया जाता है। फिर ट्रैफिक जाम में फँसकर आदमी यही सोचता है कि आखिर उसने घर से निकलने की गलती क्यों की। शहरों की सड़कें थोड़ी बारिश में ही ऐसी भर जाती हैं, मानो नगर निगम ने सड़क नहीं, तालाब निर्माण योजना चलाई हो।

बच्चों के लिए मौसम का मतलब सिर्फ स्कूल बंद होना है। गर्मी ज्यादा हो तो छुट्टी, बारिश ज्यादा हो तो छुट्टी, ठंड ज्यादा हो तो छुट्टी। बच्चे मौसम परिवर्तन को पर्यावरण संकट नहीं, अवसर के रूप में देखते हैं। दूसरी ओर ऑफिस जाने वालों के लिए हर मौसम एक सजा है। गर्मी में पसीना, बारिश में जाम और सर्दी में रजाई छोड़ने का दुख। अब तो ऐसा लगता है कि मौसम ने इंसानों से राजनीति सीख ली है। कब पलटी मारनी है, कब गरजना है और कब बिना बरसे निकल जाना है - इसमें मौसम पूरी तरह माहिर हो चुका है। आदमी बेचारा हर सुबह आसमान की तरफ उसी उम्मीद से देखता है, जैसे जनता चुनावी घोषणापत्र को देखती है।

कुल मिलाकर, मौसम अब प्रकृति का हिस्सा कम और मनोरंजन उद्योग का हिस्सा ज्यादा लगने लगा है। हर दिन नया ट्विस्ट, नया ड्रामा और नया सरप्राइज। फर्क सिर्फ इतना है कि इस शो का रिमोट किसी इंसान के हाथ में नहीं है।

 मंथन जरूरी: कोचिंग उद्योग का विस्तार शिक्षा व्यवस्था की असफलता का प्रमाण तो नहीं!

-संतराम पाण्डेय-

भारत में शिक्षा का विषय हमेशा से ही चर्चा का केंद्र रहा है। “शिक्षा ही समाज की आधारशिला हैजैसी कहावतें हमें बचपन से सुनाई जाती हैं, लेकिन असलियत में यह आधारशिला कितनी मजबूत है, यह आज सवालों के घेरे में है। स्कूलों में पढ़ाई, शिक्षक, पाठ्यक्रम और परीक्षा-इन सब पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली बच्चों के लिए कई तरह की चुनौतियाँ पैदा कर रही है। कई बार ऐसा लगता है कि शिक्षा प्रणाली अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है। सरकारें समय-समय पर शिक्षा व्यवस्था में बदलाव करती आ रही हैं लेकिन अभी वह लक्ष्य नहीं मिल पा रहा है जो शिक्षा के लिए जरूरी है। आज भी बच्चों को ज्ञान देने के बजाय उन्हें परीक्षा में अंक हासिल करने की मशीन बना दिया गया है। बच्चा सुबह स्कूल जाता है, दोपहर बाद कोचिंग और शाम को होमवर्क में उलझ जाता है। बचपन, खेल, रचनात्मकता और मानसिक संतुलन धीरे-धीरे इस दौड़ में दम तोड़ देते हैं।

    दूसरी तरफ कोचिंग संस्थानो का एक और रूप सामने आ रहा है। संचालक इतने मजबूत हो गए हैं कि अब वह शिक्षा, परीक्षा और व्यवस्था को प्रभावित करने लगे हैं। साठ दशक पार कर चुके लोग कहते सुने जाते हैं कि हमारे जमाने में तो कोचिंग नहीं थी, फिर भी हम अच्छा पढ़ते थे। बच्चों के जीवन में कोचिंग संस्थानों का स्थान शिक्षा प्रणाली के विकार को उजागर करता है। जब स्कूल खुद परीक्षा के लिए बच्चों को तैयार नहीं कर पाते, तो माता-पिता मजबूरन कोचिंग की ओर रुख करते हैं। यही वह जगह है जहाँ ‘शिक्षा माफियाका रूप सामने आता है। कोचिंग संचालक कभी-कभी बच्चों और माता-पिता की उम्मीदों का फायदा उठाकर भारी शुल्क वसूलते हैं, और शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक और सफलता तक सीमित रह जाता है। कोचिंग की इस संस्कृति ने बच्चों के जीवन में तनाव और प्रतिस्पर्धा को अत्यधिक बढ़ा दिया है। बच्चे मानसिक दबाव के कारण पढ़ाई से घृणा करने लगते हैं, जबकि उनका मूल जिज्ञासु मन कहीं दबकर रह जाता है। कोटा का कोचिंग उद्योग हो या शहरों व कस्बों में गली-गली में उग रहे कोचिंग संस्थान, इससे बच्चे का जिज्ञासु मन प्रभावित हुआ है।

कभी शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा साधन माना जाता था। कहा जाता था कि स्कूल वह जगह है जहाँ बच्चों के व्यक्तित्व का निर्माण होता है, उनके भीतर ज्ञान, संस्कार और सोचने-समझने की क्षमता विकसित होती है। लेकिन आज के दौर में यदि कोई अभिभावक अपने बच्चे की पढ़ाई को लेकर चिंतित दिखाई देता है तो उसके पीछे ठोस कारण हैं। स्कूलों में पढ़ाई का स्तर लगातार सवालों के घेरे में है, कोचिंग संस्थानों का ऐसा जाल फैल चुका है कि शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि एक बड़ा कारोबार बनकर रह गई है। स्कूल और छात्र के बीच कोचिंग का प्रवेश कब हो गया, इसका भान न स्कूलों को हुआ, न अभिभावकों को। परिणामस्वरूप आज इसका खमियाजा बच्चे उठा रहे हैं।

हालात यह हैं कि लाखों रुपये फीस लेने वाले स्कूल भी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का भरोसा नहीं दिला पा रहे। दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर बच्चे पढ़ें तो पढ़ें कैसे? शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि स्कूल अब शिक्षा के केंद्र कम और परीक्षा परिणामों के केंद्र अधिक बन गए हैं। बच्चों को विषय समझाने के बजाय उन्हें परीक्षा में अच्छे अंक लाने की तकनीक सिखाई जाती है। स्थिति इतनी चिंताजनक हो चुकी है कि कई स्कूलों में शिक्षक भी यह मानकर चलते हैं कि असली तैयारी तो कोचिंग संस्थानों में ही होगी। यानी स्कूल की फीस अलग, कोचिंग की फीस अलग।

कोचिंग उद्योग का विस्तार अपने आप में शिक्षा व्यवस्था की असफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है। यदि स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई हो रही होती तो करोड़ों रुपये का कोचिंग बाजार खड़ा ही नहीं होता। आज छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक कोचिंग संस्थानों की भरमार है। हर गली में एक नया संस्थान खुल रहा है और हर संस्थान खुद को सफलता की गारंटी बताने में जुटा है। दुर्भाग्य यह है कि कई जगह यह उद्योग अब माफिया संस्कृति का रूप ले चुका है। भारी फीस, आकर्षक विज्ञापन, फर्जी दावे और टॉपरों के नाम पर प्रचार का खेल खुलेआम चल रहा है। अभिभावकों की मजबूरी और बच्चों के भविष्य की चिंता एक बाजार में बदल गया है। शिक्षा को सेवा नहीं, उत्पाद की तरह बेचा जा रहा है।

सबसे अधिक नुकसान बच्चों को हो रहा है। उन पर कम उम्र में ही सफलता का ऐसा दबाव डाल दिया जाता है कि वे जीवन को अंकों और रैंकिंग के चश्मे से देखने लगते हैं। यदि अच्छे अंक आ गए तो बच्चा प्रतिभाशाली, नहीं आए तो वह असफल घोषित कर दिया जाता है। यह सोच न केवल गलत है बल्कि खतरनाक भी है। आज हजारों बच्चे तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। प्रतियोगिता की अंधी दौड़ ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाला है। कई बच्चों को यह तक समझ नहीं आता कि वे पढ़ाई अपने ज्ञान के लिए कर रहे हैं या केवल किसी परीक्षा में दूसरों से आगे निकलने के लिए। शिक्षा का मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट गया है।

विडंबना यह भी है कि शिक्षा नीतियों और सुधारों की घोषणाएं तो लगातार होती रहती हैं, लेकिन जमीन पर बदलाव की रफ्तार बेहद धीमी है। स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और नई तकनीकों की बातें खूब होती हैं, मगर कई स्कूल आज भी बुनियादी शिक्षण गुणवत्ता के संकट से जूझ रहे हैं। शिक्षा के नाम पर योजनाएं बनती हैं, बजट खर्च होते हैं, रिपोर्टें तैयार होती हैं, लेकिन कक्षा में बैठा बच्चा अक्सर वही पुरानी समस्याएं झेलता रहता है।

जरूरत इस बात की है कि शिक्षा को फिर से शिक्षा बनने दिया जाए। स्कूलों को इतना सक्षम बनाया जाए कि बच्चे और अभिभावक कोचिंग के सहारे रहने को मजबूर न हों। शिक्षकों की भर्ती और प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी जाए। पाठ्यक्रम को ऐसा बनाया जाए जो बच्चों को सोचने, समझने और सवाल पूछने के लिए प्रेरित करे। कोचिंग संस्थानों पर भी प्रभावी निगरानी की आवश्यकता है। शिक्षा के नाम पर मनमानी फीस वसूलने और भ्रामक दावे करने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। यदि शिक्षा बाजार के हवाले कर दी जाएगी तो गरीब और मध्यम वर्ग के लाखों बच्चों के लिए अवसरों की समानता केवल एक सपना बनकर रह जाएगी। ध्यान रहे कि शिक्षा किसी भी देश की रीढ़ होती है। यदि वही कमजोर पड़ जाए तो भविष्य भी कमजोर हो जाता है।