-संतराम पाण्डेय-
महंगाई देखकर अब लोग नहीं कहते कि उसका कोई स्टेटस नहीं है। साल 2008-09 का दौर याद कीजिए। टीवी चैनलों पर एंकर ऐसे चिल्लाते थे जैसे प्याज नहीं, जमाना 80 रुपये किलो हो गया हो। नेता मंचों से कविता पढ़ते थे — “महंगाई डायन खाय जात है!” और जनता भी पूरी श्रद्धा से मानती थी कि महंगाई सचमुच कोई चुड़ैल है, जो रसोई में घुसकर दाल, तेल और सब्ज़ी निगल जाती है।
उस समय अगर टमाटर 40 रुपये किलो हो जाता था तो अखबारों में लाल अक्षरों में छपता था— टमाटर ने बिगाड़ा रसोई का स्वाद! आज टमाटर 120 रुपये किलो हो जाए तो जनता मोबाइल निकालकर रील बनाती है — दोस्तों, आज हम बना रहे हैं ‘टमाटर दर्शन… देखिए, ये वही सब्ज़ी है जो हमारे दादा खाते थे!
पहले महंगाई “डायन थी, आज विकास की सहेली है। तब गैस सिलेंडर महंगा होता था तो लोग सड़कों पर उतर आते थे। आज सिलेंडर इतना महंगा है कि लोग उसे ड्राइंग रूम में शोपीस की तरह रखते हैं और मेहमानों से कहते हैं —बच्चों को दूर रखना, इसमें हमारी आधी सैलरी भरी हैँ। पहले पेट्रोल 5 रुपये बढ़ता था तो ऐसा माहौल बनता था मानो देश में आपातकाल लग गया हो। आज पेट्रोल 100 के पार है, लेकिन जनता ने आध्यात्मिक विकास कर लिया है। अब लोग बाइक में तेल नहीं भरवाते, आस्था भरवाते हैं। मीटर देखते हैं और मन ही मन बोलते हैं —माया है, सब माया है…।
सबसे बड़ा बदलाव भाषा में आया है। 2009 में महंगाई जनता पर हमला थी। 2026 में वही महंगाई वैश्विक परिस्थितियों का प्रभाव बन चुकी है। यानि पहले जेब कटती थी, अब अंतरराष्ट्रीय कारणों से आर्थिक पुनर्संतुलन होता है।
पहले लोग पूछते थे —दाल इतनी महंगी क्यों है?
अब पूछते हैं —EMI भरें या किडनी बचाएं?
और जनता भी कितनी समझदार हो गई है। पहले 20 रुपये बढ़ने पर सरकार बदलने की बातें होती थीं। अब 200 रुपये बढ़ जाएं तो लोग कहते हैं—चलो, कम से कम देश का सम्मान तो बढ़ रहा है।
महंगाई अब डायन नहीं रही। अब वह भारतीय परिवार की सबसे संस्कारी बहू बन चुकी है —
हर महीने चुपचाप आती है, खर्च बढ़ाती है और जाते-जाते बचत को गायब कर देती है।
और हम?
हम भी अब अनुभवी नागरिक हैं। राशन खरीदते समय कैलकुलेटर नहीं, दिल मजबूत करके जाते हैं। सब्ज़ी वाले से भाव नहीं पूछते, पहले अपना ब्लड प्रेशर चेक करते हैं।
अंत में बस इतना ही —2009 में महंगाई डायन थी क्योंकि तब जेब में उम्मीद बची हुई थी।
महंगाई अब केवल आर्थिक समस्या नहीं रही, बल्कि आम आदमी की जिंदगी का स्थायी सदस्य बन चुकी है। पहले लोग बाजार जाते थे सामान खरीदने, अब केवल दाम देखकर लौट आने की हिम्मत जुटाने जाते हैं। सब्ज़ियों के भाव सुनकर ऐसा लगता है मानो दुकानदार आलू-प्याज़ नहीं, हीरे-जवाहरात बेच रहा हो। पेट्रोल के दाम सुनकर बाइक भी सोचती होगी कि “मालिक, आज पैदल ही चले जाओ।” चाय में अब चीनी कम और चिंता ज़्यादा घुलती है। वेतन बढ़ने की खबरें केवल भाषणों में सुनाई देती हैं, जबकि खर्चे रोज़ नया रिकॉर्ड बना रहे हैं। लगता है भविष्य में दुकानों पर बोर्ड लगेगा— “सामान देखकर खुश हो जाइए, खरीदना जरूरी नहीं है।”
आज महंगाई पर व्यंग्य इसलिए लिखा जाता है क्योंकि अब हंसना ही सबसे सस्ता मनोरंजन बचा है। अब वह पहले जैसी शर्मीली नहीं रही, बल्कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बन गई। आज की महंगाई सीधे आदमी की जेब में हाथ डालकर कहती है— भाई, UPI कर दो। कभी प्याज़ आँसू निकालता था, अब सिलेंडर, स्कूल फीस और बिजली का बिल मिलकर पूरा पारिवारिक धारावाहिक बना देते हैं। वक्त है, बदल रहा है, बदलेगा तौ है ही।
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