Jun 8, 2026

 मंथन जरूरी: कोचिंग उद्योग का विस्तार शिक्षा व्यवस्था की असफलता का प्रमाण तो नहीं!

-संतराम पाण्डेय-

भारत में शिक्षा का विषय हमेशा से ही चर्चा का केंद्र रहा है। “शिक्षा ही समाज की आधारशिला हैजैसी कहावतें हमें बचपन से सुनाई जाती हैं, लेकिन असलियत में यह आधारशिला कितनी मजबूत है, यह आज सवालों के घेरे में है। स्कूलों में पढ़ाई, शिक्षक, पाठ्यक्रम और परीक्षा-इन सब पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली बच्चों के लिए कई तरह की चुनौतियाँ पैदा कर रही है। कई बार ऐसा लगता है कि शिक्षा प्रणाली अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है। सरकारें समय-समय पर शिक्षा व्यवस्था में बदलाव करती आ रही हैं लेकिन अभी वह लक्ष्य नहीं मिल पा रहा है जो शिक्षा के लिए जरूरी है। आज भी बच्चों को ज्ञान देने के बजाय उन्हें परीक्षा में अंक हासिल करने की मशीन बना दिया गया है। बच्चा सुबह स्कूल जाता है, दोपहर बाद कोचिंग और शाम को होमवर्क में उलझ जाता है। बचपन, खेल, रचनात्मकता और मानसिक संतुलन धीरे-धीरे इस दौड़ में दम तोड़ देते हैं।

    दूसरी तरफ कोचिंग संस्थानो का एक और रूप सामने आ रहा है। संचालक इतने मजबूत हो गए हैं कि अब वह शिक्षा, परीक्षा और व्यवस्था को प्रभावित करने लगे हैं। साठ दशक पार कर चुके लोग कहते सुने जाते हैं कि हमारे जमाने में तो कोचिंग नहीं थी, फिर भी हम अच्छा पढ़ते थे। बच्चों के जीवन में कोचिंग संस्थानों का स्थान शिक्षा प्रणाली के विकार को उजागर करता है। जब स्कूल खुद परीक्षा के लिए बच्चों को तैयार नहीं कर पाते, तो माता-पिता मजबूरन कोचिंग की ओर रुख करते हैं। यही वह जगह है जहाँ ‘शिक्षा माफियाका रूप सामने आता है। कोचिंग संचालक कभी-कभी बच्चों और माता-पिता की उम्मीदों का फायदा उठाकर भारी शुल्क वसूलते हैं, और शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक और सफलता तक सीमित रह जाता है। कोचिंग की इस संस्कृति ने बच्चों के जीवन में तनाव और प्रतिस्पर्धा को अत्यधिक बढ़ा दिया है। बच्चे मानसिक दबाव के कारण पढ़ाई से घृणा करने लगते हैं, जबकि उनका मूल जिज्ञासु मन कहीं दबकर रह जाता है। कोटा का कोचिंग उद्योग हो या शहरों व कस्बों में गली-गली में उग रहे कोचिंग संस्थान, इससे बच्चे का जिज्ञासु मन प्रभावित हुआ है।

कभी शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा साधन माना जाता था। कहा जाता था कि स्कूल वह जगह है जहाँ बच्चों के व्यक्तित्व का निर्माण होता है, उनके भीतर ज्ञान, संस्कार और सोचने-समझने की क्षमता विकसित होती है। लेकिन आज के दौर में यदि कोई अभिभावक अपने बच्चे की पढ़ाई को लेकर चिंतित दिखाई देता है तो उसके पीछे ठोस कारण हैं। स्कूलों में पढ़ाई का स्तर लगातार सवालों के घेरे में है, कोचिंग संस्थानों का ऐसा जाल फैल चुका है कि शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि एक बड़ा कारोबार बनकर रह गई है। स्कूल और छात्र के बीच कोचिंग का प्रवेश कब हो गया, इसका भान न स्कूलों को हुआ, न अभिभावकों को। परिणामस्वरूप आज इसका खमियाजा बच्चे उठा रहे हैं।

हालात यह हैं कि लाखों रुपये फीस लेने वाले स्कूल भी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का भरोसा नहीं दिला पा रहे। दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर बच्चे पढ़ें तो पढ़ें कैसे? शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि स्कूल अब शिक्षा के केंद्र कम और परीक्षा परिणामों के केंद्र अधिक बन गए हैं। बच्चों को विषय समझाने के बजाय उन्हें परीक्षा में अच्छे अंक लाने की तकनीक सिखाई जाती है। स्थिति इतनी चिंताजनक हो चुकी है कि कई स्कूलों में शिक्षक भी यह मानकर चलते हैं कि असली तैयारी तो कोचिंग संस्थानों में ही होगी। यानी स्कूल की फीस अलग, कोचिंग की फीस अलग।

कोचिंग उद्योग का विस्तार अपने आप में शिक्षा व्यवस्था की असफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है। यदि स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई हो रही होती तो करोड़ों रुपये का कोचिंग बाजार खड़ा ही नहीं होता। आज छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक कोचिंग संस्थानों की भरमार है। हर गली में एक नया संस्थान खुल रहा है और हर संस्थान खुद को सफलता की गारंटी बताने में जुटा है। दुर्भाग्य यह है कि कई जगह यह उद्योग अब माफिया संस्कृति का रूप ले चुका है। भारी फीस, आकर्षक विज्ञापन, फर्जी दावे और टॉपरों के नाम पर प्रचार का खेल खुलेआम चल रहा है। अभिभावकों की मजबूरी और बच्चों के भविष्य की चिंता एक बाजार में बदल गया है। शिक्षा को सेवा नहीं, उत्पाद की तरह बेचा जा रहा है।

सबसे अधिक नुकसान बच्चों को हो रहा है। उन पर कम उम्र में ही सफलता का ऐसा दबाव डाल दिया जाता है कि वे जीवन को अंकों और रैंकिंग के चश्मे से देखने लगते हैं। यदि अच्छे अंक आ गए तो बच्चा प्रतिभाशाली, नहीं आए तो वह असफल घोषित कर दिया जाता है। यह सोच न केवल गलत है बल्कि खतरनाक भी है। आज हजारों बच्चे तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। प्रतियोगिता की अंधी दौड़ ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाला है। कई बच्चों को यह तक समझ नहीं आता कि वे पढ़ाई अपने ज्ञान के लिए कर रहे हैं या केवल किसी परीक्षा में दूसरों से आगे निकलने के लिए। शिक्षा का मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट गया है।

विडंबना यह भी है कि शिक्षा नीतियों और सुधारों की घोषणाएं तो लगातार होती रहती हैं, लेकिन जमीन पर बदलाव की रफ्तार बेहद धीमी है। स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और नई तकनीकों की बातें खूब होती हैं, मगर कई स्कूल आज भी बुनियादी शिक्षण गुणवत्ता के संकट से जूझ रहे हैं। शिक्षा के नाम पर योजनाएं बनती हैं, बजट खर्च होते हैं, रिपोर्टें तैयार होती हैं, लेकिन कक्षा में बैठा बच्चा अक्सर वही पुरानी समस्याएं झेलता रहता है।

जरूरत इस बात की है कि शिक्षा को फिर से शिक्षा बनने दिया जाए। स्कूलों को इतना सक्षम बनाया जाए कि बच्चे और अभिभावक कोचिंग के सहारे रहने को मजबूर न हों। शिक्षकों की भर्ती और प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी जाए। पाठ्यक्रम को ऐसा बनाया जाए जो बच्चों को सोचने, समझने और सवाल पूछने के लिए प्रेरित करे। कोचिंग संस्थानों पर भी प्रभावी निगरानी की आवश्यकता है। शिक्षा के नाम पर मनमानी फीस वसूलने और भ्रामक दावे करने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। यदि शिक्षा बाजार के हवाले कर दी जाएगी तो गरीब और मध्यम वर्ग के लाखों बच्चों के लिए अवसरों की समानता केवल एक सपना बनकर रह जाएगी। ध्यान रहे कि शिक्षा किसी भी देश की रीढ़ होती है। यदि वही कमजोर पड़ जाए तो भविष्य भी कमजोर हो जाता है।

 

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