आज जो कुछ कहने का मन हो रहा है उसे डा कुअंर बेचैन की दो पंक्तियों ने और कुरेद दिया । वह कहते हैं -
कौन किसका साथ देता है
कौन गिरते को हाथ देता है
तुम गर चाहो तो देख लो गिरकर
दोस्त पीछे से लात देता है ।
आज गिरते रिश्तों को देख कर यकीन नहीं होता कि यह वही देश है जो वसुधैव
कुटुम्बकम को आत्मसात किये है । समाज से अपनापन रोज बेदखल होता जा
रहा है । हम दिलो दिमाग से इसे ख़ारिज करने पर तुले हैं । एक कवी ने ठीक
ही कहा है -
रिश्तों की कैसी उलझन है
शर्तों पर होते बंधन हैं
अब बंध जाने का मोह नहीं
बस खुल जाने की तड़पन है ।
बस एक बात कहनी है कि जब रिश्ते बोझ बन जाएँ तो उसे ऐसे उठायें कि जिंदगी
हलकी हो जाये । उसे बोझ न बने रहने दें ।
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