
Mar 4, 2012
Nov 13, 2011
आर्थिक आजादी के सपने का भटकाव
संतराम पाण्डेय-
आज देश तरक्की कर रहा है। विश्व में भारत की खास पहचान है। जिस रफ्तार से देश तरक्की कर रहा है, उसी रफ्तार से कुछ ऐसी चीजें छूटती जा रही हैं, जो देशवासियों के हित से गहराई से जुड़ी हैं। इसी तरक्की की रफ्तार के बीच जब यह खबर आई कि देश के लोग शहर में ३२ रुपए और गांव में २६ रुपए में गुजारा कर सकते हैं तो देश का आम आदमी सन्न रह गया। वह सोचने लगा कि क्या हमारे देश को आजाद कराने वालों ने आजाद भारत का जो सपना देखा था, वह यही था जिसमें यह परिकल्पना की जा रही है। एक बात तो सत्य है कि आजादी के बाद देश के शहरों का विकास हुआ है और गांव शहर के निकट आए हैं। एक तरह से देखा जाए तो गांवों का भी शहरीकरण हुआ है लेकिन लोगों की आर्थिक आजादी का जो सपना आजादी की लड़ाई की पीढ़ी के नेताओं ने देखा था, उससे आज हम भटक गए हैं। आर्थिक आजादी के मुद्दे पर कमजोरी आई है। आज ३२ और २६ रुपए में गुजारा कर लेने की जो कल्पना की जा रही है, यह इस बात का प्रमाण है। धन की जो असमान पहुंच हुई है, उसने देशवासियों को इस हालत में पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दरअसल देश को आजाद कराने वालों का सपना क्या था, उस पर हम नजर डालें तो बात काफी कुछ साफ हो जाती है।
आजादी के बाद गांधी जी ने नेहरू को एक पत्र लिखा। उसमें गांव के विकास की कल्पना का ताना-बाना प्रदर्शित था। पत्र का मजमून कुछ इस प्रकार था-'....तुम्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि मेरी कल्पना में वही ग्रामीण जीवन है जो आज हम देख रहे हैं। मेरे सपनों का गांव अभी तक मेरे विचारों में ही है। मेरे आदर्श गांव में बुद्धिमान मानव होंगे। वे जानवरों की तरह, गंदगी और अंधकार में नहीं रहेंगे। उसके नर-नारी स्वतंत्र होंगे और संसार में किसी के भी सामने डटे रहने की क्षमता वाले होंगे। सबको अपने हिस्से का शरीर श्रम करना होगा।Ó पंडित नेहरू ने इस पत्र का जो जवाब लिखा, अब उसके कुछ अंश- '.....मेरी समझ में नहीं आता कि गांव आवश्यक तौर पर सत्य और अहिंसा का साकार रूप क्यों होना चाहिए। सामान्यत: गांव बुद्धि और संस्कृति की दृष्टिï से पिछड़ा हुआ होता है और पिछड़े हुए वातावरण में कोई प्रगति नहीं की जा सकती। संकीर्ण विचारों के लोगों के लिए असत्यपूर्ण और हिंसक होने की संभावना ज्यादा रहती है। हमें गांव को शहर की संस्कृति के अधिक निकट पहुंचने के लिए प्रोत्साहन देना पड़ेगा। अक्तूबर १९४५ में भी गांधी जी ने पंडित नेहरू को एक पत्र लिखा था। उनका यह पत्र भारत और उसके गांव की परिकल्पना पर था। गांधी जी ने लिखा था- 'हमारे दृष्टिïकोण में जो भेद है, उसके बारे में लिखना चाहता हूं। यदि वह भेद बुनियादी है तब तो जनता को वह मालूम हो जाना चाहिए। उसे अंधकार में रखने से हमारे स्वराज्य के कार्य को हानि पहुंचेगी।Ó पत्र की इन पंक्तियों से साफ होता है कि गांधी जी के मन में स्वराज्य का जो खाका था, उससे पंडित नेहरू इत्तेफाक नहीं रखते थे और यह भी कि यह बात दोनों को पता थी लेकिन दोनों ही विचार-विमर्श के माध्यम से किसी ऐसे नतीजे पर पहुंचना चाहते थे जो कि देश की जनता के लिए हितकर हो। अब जब हम इतने दिनों बाद इन पत्रों के मजमून को देश की धारा की कसौटी पर परखते हैं तो दिखता है कि गांधी जी के विचार कहीं पीछे छूट गए हैं और पंडित नेहरू के विचार प्रभावी हैं। हम नेहरू के विकास की अवधारणा के करीब पहुंच रहे हैं। गांव को शहर बना रहे हैं जबकि संकीर्ण विचार गांव हो या शहर, कहीं भी पल और पनप सकते हैं। आज कथित विकास की दौड़ में आगे निकल रहे शहर हमारे देश के गांवों से सांस्कृतिक रूप से अभी भी पिछड़े हुए ही हैं। अब जिस विकास की रफ्तार को सरकारें हवा और पानी दे रही हैं, उसमें हैरानी की बात यह है कि भारत की७० फीसदी ग्रामीण आबादी सांस्कृतिक रूप से भी पीछे छूटती जा रही है। व्यवस्था भी इससे प्रभावित है। जातिवाद की राजनीति ने भी उसका रूप बदलने का काम किया है। वस्तुत: अब पिछड़ेपन की परिभाषा को बदलने की जरूरत है। आज जब ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की बात होती है तो व्यवस्था ही अवरोध के रूप में खड़ी दिखाई देती है और यहीं गांधी जी के स्वराज का सपना टूटता हुआ दिखाई देता है। प्रति व्यक्ति आय में दुनिया में 147 वें स्थान पर। 29 करोड़ प्रौढ़ आज भी अशिक्षित हैं। 5 करोड़ बच्चों ने प्रारंभिक स्कूल का मुंह भी नहीं देखा है। 14 करोड़ लोगों को प्राथमिक स्वास्थ सेवाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। विशिष्टï लोगों की सुरक्षा पर 361 करोड़ रुपये खर्च होता है। मंत्री परिषद् पर 50 करोड़ 52 लाख रुपये की बजट में व्यवस्था है। सरकार चलाने से सात गुना अधिक इन मंत्रियों की सुरक्षा पर खर्च है। देश की दशा सुधारने की जिम्मेदारी मूल रूप से सरकारों की है, वह चाहे राज्य की सरकारें हों अथवा देश की। जनप्रतिनिधि आज जिस दिशा में चल रहे हैं और राजनीति उन्हें जिस धारा की ओर बहा रही है, उसमें यह कम ही संभव दिखता है कि वह इस व्यवस्था से देश को उबारने में कामयाब होंगे। जनप्रतिनिधियों को चाहे वे पक्ष के हो या विपक्ष उन्हें उस जनता के दर्द को, उसके दुख को समझना होगा और लोकतंत्र के मंदिर में एक सार्थक चर्चा करनी होगी। आवश्यक चीजों और पेट्रों पदार्थो की कीमतों में वृद्घि की जिम्मेदारी से सरकार बच नहीं सकती। किसानों की आत्महत्या हो, भूख या गरीबी हो, बेरेाजगारी हो.... उससे सरकार अपना पल्ला झाड़ नहीं सकती। ऐसा क्यों है कि अनाज का इतना अधिक उत्पादन हो कि वह गोदामों में न अट पा रहा हो, अनाज सड़ रहा हों और उधर लोग बेकाबू महंगाई से त्रस्त हों। महंगाई की समस्या लगातार बनी हुई है और सरकार का रुख कुछ ऐसा है कि हम क्या करें? आंकड़े उठा कर देखकर देख लीजिए या याद पर ही जोर डालिए १९९९ में गेहंू सात रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा था। आज १७-१८ रुपये किलो गेहूं बिक रहा है। आम आदमी का साधारण चावल इन्हीं दिनों आठ रुपये किलो था, पर आज १६-२० रुपये प्रति किलो बिक रहा है। जानकारों का बताना है कि हमारे खान-पान की सामग्री की कीमत एक साल में २० प्रतिशत के लगभग बढ गई है। अर्जुन सेन गुप्त एवं अन्य जानकारों के यह कहने से क्या फर्क पड़ता है कि हमारे देश में ८४ करोड़ लोगों की प्रतिदिन औसत आय बीस रुपये है। यह आइने की तरह साफ है कि हमारे देश के तत्कालीन कर्णधारों का यह सपना नहीं था कि जिसके हाथ में देशवासी अपनी तकदीर सौंप रहे हों, वह घपले और घोटाले करे तथा जेल की शोभा बढ़ाए। आज देश के कर्णधारों को ही यह सोचना होगा कि देश को इन परिस्थितियों से उबारने का रास्ता क्या हो?
आज देश तरक्की कर रहा है। विश्व में भारत की खास पहचान है। जिस रफ्तार से देश तरक्की कर रहा है, उसी रफ्तार से कुछ ऐसी चीजें छूटती जा रही हैं, जो देशवासियों के हित से गहराई से जुड़ी हैं। इसी तरक्की की रफ्तार के बीच जब यह खबर आई कि देश के लोग शहर में ३२ रुपए और गांव में २६ रुपए में गुजारा कर सकते हैं तो देश का आम आदमी सन्न रह गया। वह सोचने लगा कि क्या हमारे देश को आजाद कराने वालों ने आजाद भारत का जो सपना देखा था, वह यही था जिसमें यह परिकल्पना की जा रही है। एक बात तो सत्य है कि आजादी के बाद देश के शहरों का विकास हुआ है और गांव शहर के निकट आए हैं। एक तरह से देखा जाए तो गांवों का भी शहरीकरण हुआ है लेकिन लोगों की आर्थिक आजादी का जो सपना आजादी की लड़ाई की पीढ़ी के नेताओं ने देखा था, उससे आज हम भटक गए हैं। आर्थिक आजादी के मुद्दे पर कमजोरी आई है। आज ३२ और २६ रुपए में गुजारा कर लेने की जो कल्पना की जा रही है, यह इस बात का प्रमाण है। धन की जो असमान पहुंच हुई है, उसने देशवासियों को इस हालत में पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दरअसल देश को आजाद कराने वालों का सपना क्या था, उस पर हम नजर डालें तो बात काफी कुछ साफ हो जाती है।
आजादी के बाद गांधी जी ने नेहरू को एक पत्र लिखा। उसमें गांव के विकास की कल्पना का ताना-बाना प्रदर्शित था। पत्र का मजमून कुछ इस प्रकार था-'....तुम्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि मेरी कल्पना में वही ग्रामीण जीवन है जो आज हम देख रहे हैं। मेरे सपनों का गांव अभी तक मेरे विचारों में ही है। मेरे आदर्श गांव में बुद्धिमान मानव होंगे। वे जानवरों की तरह, गंदगी और अंधकार में नहीं रहेंगे। उसके नर-नारी स्वतंत्र होंगे और संसार में किसी के भी सामने डटे रहने की क्षमता वाले होंगे। सबको अपने हिस्से का शरीर श्रम करना होगा।Ó पंडित नेहरू ने इस पत्र का जो जवाब लिखा, अब उसके कुछ अंश- '.....मेरी समझ में नहीं आता कि गांव आवश्यक तौर पर सत्य और अहिंसा का साकार रूप क्यों होना चाहिए। सामान्यत: गांव बुद्धि और संस्कृति की दृष्टिï से पिछड़ा हुआ होता है और पिछड़े हुए वातावरण में कोई प्रगति नहीं की जा सकती। संकीर्ण विचारों के लोगों के लिए असत्यपूर्ण और हिंसक होने की संभावना ज्यादा रहती है। हमें गांव को शहर की संस्कृति के अधिक निकट पहुंचने के लिए प्रोत्साहन देना पड़ेगा। अक्तूबर १९४५ में भी गांधी जी ने पंडित नेहरू को एक पत्र लिखा था। उनका यह पत्र भारत और उसके गांव की परिकल्पना पर था। गांधी जी ने लिखा था- 'हमारे दृष्टिïकोण में जो भेद है, उसके बारे में लिखना चाहता हूं। यदि वह भेद बुनियादी है तब तो जनता को वह मालूम हो जाना चाहिए। उसे अंधकार में रखने से हमारे स्वराज्य के कार्य को हानि पहुंचेगी।Ó पत्र की इन पंक्तियों से साफ होता है कि गांधी जी के मन में स्वराज्य का जो खाका था, उससे पंडित नेहरू इत्तेफाक नहीं रखते थे और यह भी कि यह बात दोनों को पता थी लेकिन दोनों ही विचार-विमर्श के माध्यम से किसी ऐसे नतीजे पर पहुंचना चाहते थे जो कि देश की जनता के लिए हितकर हो। अब जब हम इतने दिनों बाद इन पत्रों के मजमून को देश की धारा की कसौटी पर परखते हैं तो दिखता है कि गांधी जी के विचार कहीं पीछे छूट गए हैं और पंडित नेहरू के विचार प्रभावी हैं। हम नेहरू के विकास की अवधारणा के करीब पहुंच रहे हैं। गांव को शहर बना रहे हैं जबकि संकीर्ण विचार गांव हो या शहर, कहीं भी पल और पनप सकते हैं। आज कथित विकास की दौड़ में आगे निकल रहे शहर हमारे देश के गांवों से सांस्कृतिक रूप से अभी भी पिछड़े हुए ही हैं। अब जिस विकास की रफ्तार को सरकारें हवा और पानी दे रही हैं, उसमें हैरानी की बात यह है कि भारत की७० फीसदी ग्रामीण आबादी सांस्कृतिक रूप से भी पीछे छूटती जा रही है। व्यवस्था भी इससे प्रभावित है। जातिवाद की राजनीति ने भी उसका रूप बदलने का काम किया है। वस्तुत: अब पिछड़ेपन की परिभाषा को बदलने की जरूरत है। आज जब ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की बात होती है तो व्यवस्था ही अवरोध के रूप में खड़ी दिखाई देती है और यहीं गांधी जी के स्वराज का सपना टूटता हुआ दिखाई देता है। प्रति व्यक्ति आय में दुनिया में 147 वें स्थान पर। 29 करोड़ प्रौढ़ आज भी अशिक्षित हैं। 5 करोड़ बच्चों ने प्रारंभिक स्कूल का मुंह भी नहीं देखा है। 14 करोड़ लोगों को प्राथमिक स्वास्थ सेवाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। विशिष्टï लोगों की सुरक्षा पर 361 करोड़ रुपये खर्च होता है। मंत्री परिषद् पर 50 करोड़ 52 लाख रुपये की बजट में व्यवस्था है। सरकार चलाने से सात गुना अधिक इन मंत्रियों की सुरक्षा पर खर्च है। देश की दशा सुधारने की जिम्मेदारी मूल रूप से सरकारों की है, वह चाहे राज्य की सरकारें हों अथवा देश की। जनप्रतिनिधि आज जिस दिशा में चल रहे हैं और राजनीति उन्हें जिस धारा की ओर बहा रही है, उसमें यह कम ही संभव दिखता है कि वह इस व्यवस्था से देश को उबारने में कामयाब होंगे। जनप्रतिनिधियों को चाहे वे पक्ष के हो या विपक्ष उन्हें उस जनता के दर्द को, उसके दुख को समझना होगा और लोकतंत्र के मंदिर में एक सार्थक चर्चा करनी होगी। आवश्यक चीजों और पेट्रों पदार्थो की कीमतों में वृद्घि की जिम्मेदारी से सरकार बच नहीं सकती। किसानों की आत्महत्या हो, भूख या गरीबी हो, बेरेाजगारी हो.... उससे सरकार अपना पल्ला झाड़ नहीं सकती। ऐसा क्यों है कि अनाज का इतना अधिक उत्पादन हो कि वह गोदामों में न अट पा रहा हो, अनाज सड़ रहा हों और उधर लोग बेकाबू महंगाई से त्रस्त हों। महंगाई की समस्या लगातार बनी हुई है और सरकार का रुख कुछ ऐसा है कि हम क्या करें? आंकड़े उठा कर देखकर देख लीजिए या याद पर ही जोर डालिए १९९९ में गेहंू सात रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा था। आज १७-१८ रुपये किलो गेहूं बिक रहा है। आम आदमी का साधारण चावल इन्हीं दिनों आठ रुपये किलो था, पर आज १६-२० रुपये प्रति किलो बिक रहा है। जानकारों का बताना है कि हमारे खान-पान की सामग्री की कीमत एक साल में २० प्रतिशत के लगभग बढ गई है। अर्जुन सेन गुप्त एवं अन्य जानकारों के यह कहने से क्या फर्क पड़ता है कि हमारे देश में ८४ करोड़ लोगों की प्रतिदिन औसत आय बीस रुपये है। यह आइने की तरह साफ है कि हमारे देश के तत्कालीन कर्णधारों का यह सपना नहीं था कि जिसके हाथ में देशवासी अपनी तकदीर सौंप रहे हों, वह घपले और घोटाले करे तथा जेल की शोभा बढ़ाए। आज देश के कर्णधारों को ही यह सोचना होगा कि देश को इन परिस्थितियों से उबारने का रास्ता क्या हो?
सांप गुजरने के बाद लकीर की पिटाई
-संतराम पाण्डेय-
अध्यात्म के देश में अब एक अजीब तरह का बदलाव आ रहा है। आध्यात्मिक आयोजनों में भगदड़ मच रही है और लोग दब और कुचल कर प्राण त्याग कर रहे हैं। अभी हाल ही में हरिद्वार में एक आयोजन में भगदड़ हुई जिसमें अनेक लोगों की जानें गई। अशांत मनुष्य शांति के लिए भटक रहा है। एक समृद्ध आध्यात्मिक देश में इस तरह की घटना अत्यंत दुखद है। इसके पूर्व भी देश में अनेक घटनाएं हो चुकी हैं। इसलिए और दुखद यह है कि इन घटनाओं को रोकने के लिए कोई सार्थक उपाय नहीं किए गए। सिवाय एक दूसरे पर दोषारोपण के। कथा और प्रवचन हमारी परंपराओं में शामिल हैं। इसलिए समाज के हर व्यक्ति का दायित्व है कि शांति की तलाश में जुटे हर व्यक्ति की सुरक्षा समाज और प्रशासन भी करे। ऐसे आयोजनों में व्यवस्था के लिए प्रशासन का दायित्व है कि वह स्वत: स्फूर्त हो व्यवस्था में भागीदारी करे। ऐसा न होने के पीछे कारण यह लगता है कि हम कहीं न कहीं अध्यात्म से विमुख हो रहे हैं।
अध्यात्म को लेकर अब तरह-तरह की चर्चाएं भी होती हैं लेकिन उनका कोई सार्थक हल नहीं निकल रहा है। परिणाम यह है कि अध्यात्म से जुड़े लोगों में एक अजीब तरह का भटकाव आ रहा है। अध्यात्म से जो शांति मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल रही है। अध्यात्म को लेकर एक परिवर्तन और देखने को मिल रहा है। वह यह कि आध्यात्मिकजनों में एक अजीब किस्म की बेचैनी परिलक्षित हो रही है। नतीजा यह कि उनको शांति के लिए भटकना पड़ रहा है। दरअसल इस भटकाव के पीछे एक बात यह भी है कि अध्यात्म की तरह-तरह की परिभाषाएं गढ़ ली गईं हैं। इसलिए यह जरूरी है कि पहले अध्यात्म की सही परिभाषा समझें। अध्यात्म शब्द आत्म में अधि उपसर्ग लगाकर बना है जिसका अर्थ है आत्मा को ऊपर उठाना अथवा आत्मोन्नति। जो व्यक्ति परम-आत्मा में स्वयं को सम्मिलित मानता है वह अध्यात्म के स्वयं को करीब मानता है। आत्मिक उन्नत्ति प्राप्त करने के बाद यह महसूस होने लगता है कि परमात्मा का ही अंश हममें विद्यमान है। इसलिए हम परमात्मा के ही अंश हैं। यह तथ्य स्पष्टï होने के बाद व्यक्ति वही कुछ करता है जो उसकी आत्मा निर्देशित करती है और आध्यात्मिक व्यक्ति मानते हैं कि आत्मा का निर्देशन कभी गलत नहीं होता। समाज में आज तरह-तरह की भ्रांतियां फैली हैं। इन भ्रांतियों से छुटकारा पाने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति आध्यात्मिक हो। अध्यात्म और समाज का बड़ा गहरा संबंध है। समाज अध्यात्म के बिना पंगु है। बिना अध्यात्म के उसे सही निर्देशन नहीं मिल सकता। परिणामस्वरूप उसमें आसुरी प्रवृत्तियां जन्म लेने लगती है और वह असुरों जैसा व्यवहार करने लगता है जो कि समाज विरोधी है। एक तरह से यह कहा जाए कि समाज अध्यात्म की कसौटी है और अध्यात्म समाज की आत्मा तो उचित ही होगा। अध्यात्मविहीन समाज में जब आसुरी प्रवृत्तियां बढऩे लगती हैं तो सामाजिक और मानवीय मूल्यों तथा सभ्यता और संस्कृति का पतन होने लगता है। त्रेता युग में श्रीराम का अवतार ऐसे वक्त हुआ जब आध्यात्मिक शक्तियों का पूरी तरह पतन होने लगा था। उन्होंने अध्यात्मविहीन समाज में आसुरी प्रवृत्तियों को नष्टï करने का बीड़ा उठाया। इसका परिणाम यह हुआ कि समाज फिर से अध्यात्म के साथ चलने लगा।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में स्पष्टï बताया है कि अध्यात्म से जुड़े रहने के लिए सबसे आसान उपाय क्या हैं? कलयुग में केवल राम-नाम का जप ही एक आधार बताया गया है। महाकवि दूरदृष्टïा थे। शायद उन्होंने समझ लिया था कि कलयुग में मनुष्य के पास इतना वक्त नहीं रहेगा कि वह वर्षों तो क्या घंटे भर भी अपनी आत्मिक शांति के लिए अध्यात्म से जुड़े रहने का उपाय कर सके। इसीलिए नाम को ही उन्होंने आधार बताया। अध्यात्म से ही समाज में नैतिकता की स्थापना होती है। एक अध्यात्मविहीन समाज के अनैतिक होने की शत-प्रतिशत संभावना बनी रहती है।
द्वापर में गुरु द्रोणाचार्य ने पांडव और कौरवों को नैतिकता का पहला पाठ पढ़ाते हुए कहा था कि सत्यम् वद अर्थात् सत्य बोलो। उनका मानना था कि सत्य के साथ ही नैतिकता की स्थापना हो सकती है। इतिहास साक्षी है कि समाज नैतिकता के बल से ही प्रतिष्ठित होता है। जिन्होंने उनकी शिक्षा को ग्रहण किया वह नैतिक बने और जो नैतिकता का यह पहला पाठ नहीं पढ़ सके वह अनैतिक हो गए और उन्हीं का विनाश हुआ। अनैतिक समाज में लोभी, कपटी, झूठे, आतताई और निर्लज्ज व्यक्तियों का बोल-बाला हो जाता है जिससे अध्यात्म समाप्त हो जाता है। एक नैतिक व्यक्ति अध्यात्म को जीवित रखता है। स्वामी विवेकानंद ने भी नैतिकता का यही पाठ शिकागो में पढ़ाया। हमारे अनेक महापुरुषों का उद्देश्य यही रहा है कि समाज में अध्यात्म की स्थापना हो और समाज नैतिक बने। नैतिकता की कोई पाठशाला नहीं होती परिवार व्यक्ति की प्रथम पाठशाला है और मां प्रथम शिक्षक है। परिवार ही समाज की प्रथम इकाई हैं। जहां से व्यक्ति की शिक्षा-दीक्षा शुरू होती है। इसीलिए अध्यात्म और नैतिकता का पाठ पढ़ाने में माताओं की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसीलिए समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह मातृ शक्ति के उत्थान के लिए कदम उठाए। आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने अभी हाल ही में कहा है कि सिर्फ अध्यात्म से ही भ्रष्टïाचार को समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने स्पष्टï कहा कि अपनत्व और अध्यात्म का अभाव है जिसकी वजह से भ्रष्टïाचार पनप रहा है। हम अपनी परंपराओं, सभ्यता और संस्कृति पर निगाह डालते हैं तो साफ दिखाई देता है कि हमारी सभ्यता और संस्कृति तथा परंपराएं बड़ी समृद्ध रही हैं। अध्यात्म के कारण ही भारत को विश्व गुरु का दर्जा मिला था। आज जगह-जगह प्रवचन और कथाओं का आयोजन किया जाता है। हजारों-लाखों लोग उसमें एकत्र होते हैं। तर्क यह होता है कि यह सब अध्यात्म और नैतिकता की स्थापना के लिए हो रहा है लेकिन समाज पर इनका असर नहीं पड़ रहा है। न समाज आध्यात्मिक बन पा रहा है और न ही नैतिक। ऐसा आभास होता है कि हमारे कर्म में कहीं न कहीं त्रुटि है जिसे हमें खोजना चाहिए। भौतिक उन्नति से मनुष्य संतुष्टï नहीं हो सकता। आध्यात्मिक उन्नति जरूरी है और उसी से समाज नैतिक बनेगा। हरिद्वार गायत्री पीठ में हुई घटना के लिए अब दोषियों की तलाश हो रही है। यानि सांप के गुजर जाने के बाद लकीर पीटी जा रही है। वस्तुत: इस घटना के लिए दोषी हमारी वह व्यवस्था है जो अध्यात्म और परंपराओं से विमुख होती जा रही है। वास्तव में अध्यात्म हममें रचा-बसा है। इससे विमुख होकर केवल कष्टï ही मिल सकता है और अध्यात्म युक्त समाज नैतिकता के सहारे तरक्की की राह पर अग्रसर रहेगा।
अध्यात्म के देश में अब एक अजीब तरह का बदलाव आ रहा है। आध्यात्मिक आयोजनों में भगदड़ मच रही है और लोग दब और कुचल कर प्राण त्याग कर रहे हैं। अभी हाल ही में हरिद्वार में एक आयोजन में भगदड़ हुई जिसमें अनेक लोगों की जानें गई। अशांत मनुष्य शांति के लिए भटक रहा है। एक समृद्ध आध्यात्मिक देश में इस तरह की घटना अत्यंत दुखद है। इसके पूर्व भी देश में अनेक घटनाएं हो चुकी हैं। इसलिए और दुखद यह है कि इन घटनाओं को रोकने के लिए कोई सार्थक उपाय नहीं किए गए। सिवाय एक दूसरे पर दोषारोपण के। कथा और प्रवचन हमारी परंपराओं में शामिल हैं। इसलिए समाज के हर व्यक्ति का दायित्व है कि शांति की तलाश में जुटे हर व्यक्ति की सुरक्षा समाज और प्रशासन भी करे। ऐसे आयोजनों में व्यवस्था के लिए प्रशासन का दायित्व है कि वह स्वत: स्फूर्त हो व्यवस्था में भागीदारी करे। ऐसा न होने के पीछे कारण यह लगता है कि हम कहीं न कहीं अध्यात्म से विमुख हो रहे हैं।
अध्यात्म को लेकर अब तरह-तरह की चर्चाएं भी होती हैं लेकिन उनका कोई सार्थक हल नहीं निकल रहा है। परिणाम यह है कि अध्यात्म से जुड़े लोगों में एक अजीब तरह का भटकाव आ रहा है। अध्यात्म से जो शांति मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल रही है। अध्यात्म को लेकर एक परिवर्तन और देखने को मिल रहा है। वह यह कि आध्यात्मिकजनों में एक अजीब किस्म की बेचैनी परिलक्षित हो रही है। नतीजा यह कि उनको शांति के लिए भटकना पड़ रहा है। दरअसल इस भटकाव के पीछे एक बात यह भी है कि अध्यात्म की तरह-तरह की परिभाषाएं गढ़ ली गईं हैं। इसलिए यह जरूरी है कि पहले अध्यात्म की सही परिभाषा समझें। अध्यात्म शब्द आत्म में अधि उपसर्ग लगाकर बना है जिसका अर्थ है आत्मा को ऊपर उठाना अथवा आत्मोन्नति। जो व्यक्ति परम-आत्मा में स्वयं को सम्मिलित मानता है वह अध्यात्म के स्वयं को करीब मानता है। आत्मिक उन्नत्ति प्राप्त करने के बाद यह महसूस होने लगता है कि परमात्मा का ही अंश हममें विद्यमान है। इसलिए हम परमात्मा के ही अंश हैं। यह तथ्य स्पष्टï होने के बाद व्यक्ति वही कुछ करता है जो उसकी आत्मा निर्देशित करती है और आध्यात्मिक व्यक्ति मानते हैं कि आत्मा का निर्देशन कभी गलत नहीं होता। समाज में आज तरह-तरह की भ्रांतियां फैली हैं। इन भ्रांतियों से छुटकारा पाने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति आध्यात्मिक हो। अध्यात्म और समाज का बड़ा गहरा संबंध है। समाज अध्यात्म के बिना पंगु है। बिना अध्यात्म के उसे सही निर्देशन नहीं मिल सकता। परिणामस्वरूप उसमें आसुरी प्रवृत्तियां जन्म लेने लगती है और वह असुरों जैसा व्यवहार करने लगता है जो कि समाज विरोधी है। एक तरह से यह कहा जाए कि समाज अध्यात्म की कसौटी है और अध्यात्म समाज की आत्मा तो उचित ही होगा। अध्यात्मविहीन समाज में जब आसुरी प्रवृत्तियां बढऩे लगती हैं तो सामाजिक और मानवीय मूल्यों तथा सभ्यता और संस्कृति का पतन होने लगता है। त्रेता युग में श्रीराम का अवतार ऐसे वक्त हुआ जब आध्यात्मिक शक्तियों का पूरी तरह पतन होने लगा था। उन्होंने अध्यात्मविहीन समाज में आसुरी प्रवृत्तियों को नष्टï करने का बीड़ा उठाया। इसका परिणाम यह हुआ कि समाज फिर से अध्यात्म के साथ चलने लगा।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में स्पष्टï बताया है कि अध्यात्म से जुड़े रहने के लिए सबसे आसान उपाय क्या हैं? कलयुग में केवल राम-नाम का जप ही एक आधार बताया गया है। महाकवि दूरदृष्टïा थे। शायद उन्होंने समझ लिया था कि कलयुग में मनुष्य के पास इतना वक्त नहीं रहेगा कि वह वर्षों तो क्या घंटे भर भी अपनी आत्मिक शांति के लिए अध्यात्म से जुड़े रहने का उपाय कर सके। इसीलिए नाम को ही उन्होंने आधार बताया। अध्यात्म से ही समाज में नैतिकता की स्थापना होती है। एक अध्यात्मविहीन समाज के अनैतिक होने की शत-प्रतिशत संभावना बनी रहती है।
द्वापर में गुरु द्रोणाचार्य ने पांडव और कौरवों को नैतिकता का पहला पाठ पढ़ाते हुए कहा था कि सत्यम् वद अर्थात् सत्य बोलो। उनका मानना था कि सत्य के साथ ही नैतिकता की स्थापना हो सकती है। इतिहास साक्षी है कि समाज नैतिकता के बल से ही प्रतिष्ठित होता है। जिन्होंने उनकी शिक्षा को ग्रहण किया वह नैतिक बने और जो नैतिकता का यह पहला पाठ नहीं पढ़ सके वह अनैतिक हो गए और उन्हीं का विनाश हुआ। अनैतिक समाज में लोभी, कपटी, झूठे, आतताई और निर्लज्ज व्यक्तियों का बोल-बाला हो जाता है जिससे अध्यात्म समाप्त हो जाता है। एक नैतिक व्यक्ति अध्यात्म को जीवित रखता है। स्वामी विवेकानंद ने भी नैतिकता का यही पाठ शिकागो में पढ़ाया। हमारे अनेक महापुरुषों का उद्देश्य यही रहा है कि समाज में अध्यात्म की स्थापना हो और समाज नैतिक बने। नैतिकता की कोई पाठशाला नहीं होती परिवार व्यक्ति की प्रथम पाठशाला है और मां प्रथम शिक्षक है। परिवार ही समाज की प्रथम इकाई हैं। जहां से व्यक्ति की शिक्षा-दीक्षा शुरू होती है। इसीलिए अध्यात्म और नैतिकता का पाठ पढ़ाने में माताओं की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसीलिए समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह मातृ शक्ति के उत्थान के लिए कदम उठाए। आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने अभी हाल ही में कहा है कि सिर्फ अध्यात्म से ही भ्रष्टïाचार को समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने स्पष्टï कहा कि अपनत्व और अध्यात्म का अभाव है जिसकी वजह से भ्रष्टïाचार पनप रहा है। हम अपनी परंपराओं, सभ्यता और संस्कृति पर निगाह डालते हैं तो साफ दिखाई देता है कि हमारी सभ्यता और संस्कृति तथा परंपराएं बड़ी समृद्ध रही हैं। अध्यात्म के कारण ही भारत को विश्व गुरु का दर्जा मिला था। आज जगह-जगह प्रवचन और कथाओं का आयोजन किया जाता है। हजारों-लाखों लोग उसमें एकत्र होते हैं। तर्क यह होता है कि यह सब अध्यात्म और नैतिकता की स्थापना के लिए हो रहा है लेकिन समाज पर इनका असर नहीं पड़ रहा है। न समाज आध्यात्मिक बन पा रहा है और न ही नैतिक। ऐसा आभास होता है कि हमारे कर्म में कहीं न कहीं त्रुटि है जिसे हमें खोजना चाहिए। भौतिक उन्नति से मनुष्य संतुष्टï नहीं हो सकता। आध्यात्मिक उन्नति जरूरी है और उसी से समाज नैतिक बनेगा। हरिद्वार गायत्री पीठ में हुई घटना के लिए अब दोषियों की तलाश हो रही है। यानि सांप के गुजर जाने के बाद लकीर पीटी जा रही है। वस्तुत: इस घटना के लिए दोषी हमारी वह व्यवस्था है जो अध्यात्म और परंपराओं से विमुख होती जा रही है। वास्तव में अध्यात्म हममें रचा-बसा है। इससे विमुख होकर केवल कष्टï ही मिल सकता है और अध्यात्म युक्त समाज नैतिकता के सहारे तरक्की की राह पर अग्रसर रहेगा।
Aug 17, 2011
हमारा कसूर क्या है
हमने उन्हें चुना
जो लगे अच्छे
अब वो बिगड़ गए
तो मेरा कसूर
क्या है !
वो आये थे वोट मांगने
दे दिया हंसकर
अब वो रुलाने लगे
तो मेरा कसूर
क्या है !
जो लगे अच्छे
अब वो बिगड़ गए
तो मेरा कसूर
क्या है !
वो आये थे वोट मांगने
दे दिया हंसकर
अब वो रुलाने लगे
तो मेरा कसूर
क्या है !
Aug 12, 2011
ट्रैफिक व्यवस्था पर भीड़ भारी
सड़क पर बढती भीड़ अब ट्रैफिक व्यवस्था पर भारी पड़ रही हैं। रोज व्यवस्था सुधारने की बातें होती हैं लेकिन हालात सुधरते नही। हालत यह है जैसे चादर जरूरत से ज्यादा छोटी है। एक तरफ पैर ढंकते है तो दूसरी तरफ बदन उघड़ जाता हैं। अधिकारी ट्रैफिक से परेषान है और सड़क पर चलने वाले लोग व्यवस्थ से। न व्यवस्था सुधर रही है और न लोगों की समस्या का समाधान हो रहा है। जिस तरह से विभागीय अधिकारी व्यवस्था बनाने में ओैर पब्लिक इस समस्या से जूझ रह हैं, उससे लगता है कि सटीक समाधान की दिषा में हमारे ेकदम बढ ही नहीं पा रहे हैं। यानि कि मर्ज कुछ और है और दवा कुछ और दी जा रही है। इससे इलाज कहां संभव है। परिणाम सामने है कि रोज दुर्घटनाएं हो रही हैं और लोग मर ाहे हैं या अपंग हो रहे हैं। सुचारू ट्रफिक के लिए जो नियम कायदे बने हैं, उनका पालन करना लोग अपनी हेठी समझते हैं। जगह-जगह सड़कों के किनारे लिखा मिल जाता है कि षराब पीका वाहान न चालाएं, जगह मिलने पर ही ओवरटेक कों लेकिन लोग हैं कि मानते ही नहीं। खुद भी टक्का खा रहे हैं और दूसरो को भी टक्कर दे रहे हैं।सड़क की भीड़ केवल भारत की ही समस्या नहीं है। कई देषो मे ट्रैफिक समस्या है। कुछ दंषो ने समाधन ढूंढ लिए और कुछ अभी संघर्श कर रहे हैं। जिन देषों ने अपने देष की जरूरतों, सामाजिक ढांचे और संसाधनों को ध्यान मे रखा,वह इस समस्या से पार पा चुके है। लंदन, थाइलैंड, मलेषिया और जापान जैसे दषों मे लोग जाम से निजात पा चुके हैं। लंदन मे कई स्थान अैर बाजार ऐसे हैं, जहां केवल पब्लिक ट्रांस्पोबर्् से ही जाया जा सकता है। निजी वाहन या तो घर छोड़कर लोग जाते हैं अथवा पार्किग मे पार्क करतेे हैं। यह नियम पूरी स्ख्ती से लागू किया जाता है कि प्वाइंटेड बिंदुओं पर जाने के लिए पब्लिक ट्रांस्पोर्ट का ही सहारा ले। कुछ देषों ने एक और विकल्प तैयार किया है। बाजार अथवा भीड़-भाड़ वाले स्थान पर यदि कोई अपनी गाड़ी से जाता है तो उसके लिए उसे ााएक तयषुदा धनराषि टैक्स के रूप् में अदा करनी पड़ती है। अपने देष की बात करें जो यह समस्या किसी एक षहर की नहीें है। देष केक प्रायः सभी छोटे-बड़े षहर इस समस्या से जूझ रहे हैं और ट्रेैफिक नियमों का परलन न करने से देष की सड़के रोज खून से लाल हो रही है। दरअसल ट्रैफिक के दो परबर्् हैं-षहरी ट्रफिक ओैर हाई-वे ट्रैफिक। षहरी ट्रफिक जाम जैसी समस्या को जन्म देता है जिसमें बेषकीमती तेल का दुरूप्योग होता है और हाई-वे ट्रैफिक दुर्घटनाओं को दावकत देता है जिसमे बेषकीमजी जानें जाती हैं। सुचारू ट्रैफिक की व्यवस्था से दोनों को रोका जा सकता है लेकिन इसके लिए हमें परंपरागत ट्रफिक व्यवस्था सक दामनों को रोका जा सकता है लेकिन इसकके लिए हमें परंपरागत ट्रैफिक व्यवस्था को अपनाने की ओर उन्मुख होना पढ़गा। केसी हो हमारी परंपरागत ट्रैफिक व्यवस्था, इस ओर भी हमें ध्यान देना होगा।अभी तो केवल हवा में तीर मारे जा रहे हैं। सड़कों के किनारे चेतावनी लिख देने मात्र से काम नहीं चलने वाला, जो ट्रफिक प्लान बने, उस पर अमल भी उसी तत्परता से हो।इस दिषा मे एक बात और आड़े आ रही है। ट्रैफिक की समस्या के समाधान में लोगों का जो सहयोग मिलना चाहिए वह नहीं मिलता। समस्याओं को टालना, उनका सामना न करना या अस्थाई समाधान खोजना लोगों की आदत बन गई है। षहरों का अंधाधंुध ओैर बिना समझे-बूझे विस्तार, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अभाव, सड़को और पुलों का अभाव, यातायात के नियमों का पालन न करना आदि कारण हैं जिन पर समग्र रूप् से विचार किए जाने की जरूरत है। प्रषासन का रवैया टालने वाला है। जाहिर हैं समस्या के प्रति गंभीर रूझान का अभाव और व्यक्तिगत ढंग से समाधान खोजने की प्रवृति से समस्या विकराल रूप् धारण कर रही है।एक समस्या और है जो हमारी सोच से जुड़ी है। सड़को पर चलने वाली गाड़ियां संपन्नता का प्रतीक बन गई हैं। इसका परिणम साफ दिख रहा है कि चार सदस्यों के संपन्न परिवारो मे चार नहीं छह-छह गाड़िया है और जब वह कहीं निकलते हैं जो अलग-अलग गाड़ियो मे सड़को पर उतरते हैं। संपन्नता बढ़ी है। जो लोग पहले साइकिलों से चलते थे, अ बवह गाड़ियो से चलने लगे हैं। संपन्नजा का बढना किसी भी देष और षहर की आवष्यकता तथा उपलब्धता को भी याद रखना जरूरी है। सडकें कम हो अथवा उनकी चौड़ाई कम हो तो संपन्न लोगों को स्वतः ही इससे बचना चाहिए। लेकिन हमारे देष मे इसका उल्टा हो रहो है। अपने षहर की अति च्यस्त बाजार में ही क्यों न जाना हो, लेकिन कार से ही जाएंगे और कार वहां तक जाएगी, जहां हमें खरीदारी करनी होगी, भले ही बाजार मे कितनी भीड़ क्यो न हो। यह सामंती सोच को दर्षाती है। इससे बचना होगा और पार्किग की व्यवस्था करनी ही होगी तथा सुचारू ट्रैफिक के लिए जो नियम बानाए गए है उनका पालन करना ही होगा। आज ट्रैफिक लाइटों का भी अतिक्रमण करते लोगों को देखा जा सकता है। उन्नीसवीं षताब्दी मे जब ट्रैफिक लाइट की षुरूआत हुई तो उस समय मोटर गाड़ियो का प्रचलन नहीं था। लंदन मे ब्रिटिष पार्लियामेंट हाउस के निकट दुनिया की पहली ट्रैफिक लाइट लगी थी। इसके नीचे एक लालटेन रखी जाती थी और लाइट को घुमाया जाता था। बाद मे इसमें काफी सुधार हुआ। 1912 मे एक पुलिय अधिकारी लेस्टर वायर ने इसका आविश्कार किया। आज षहरों के अति व्यस्त चौराहों तथा दुर्घटना संभावित स्थानों पर ट्रैफिक लाइट लगी होती है, लेकिन लोग उसका अनुसरण नहीं करते जो कि दुर्घटनाओं और जाम का कारण बनती हैं।दुर्घटनाओं और सड़कों पर लगने चाले जाम से छुटकारा पाने के लिए जरूरी है कि लियमों का पालन सख्ती से हो और भीड़भाड़ वाले स्थानों पर वाहन प्रतिबंधित किए जाएं।
Aug 11, 2011
मेरा घर
लगता है कि
यह मेरा ही
घर है
वही जो काफी
पहले कही गम गया था
अब आकर
मिला दुबारा
मेरे अपनों के साथ
मेरा अपना घर।
यह मेरा ही
घर है
वही जो काफी
पहले कही गम गया था
अब आकर
मिला दुबारा
मेरे अपनों के साथ
मेरा अपना घर।
Aug 9, 2011
जीवन में भटकाव, समस्या की जड़
‘शिक्षा प्रारम्भ करने से पहले एक शिष्य गुरु से अपनी कुछ शंकाओं का समाधान करने के उद्देश्य से आया। उसने गुरु से पूछा-मनुष्य के जीवन का उद्देश्य क्या है? गुरू ने जवाब दिया- मैं नहीं बता सकता। शिष्य ने फिर पूछा-जीवन का अर्थ क्या है? गुरू ने फिर मना कर दिया। इसके बाद शिष्य ने पूछा- मृत्यु क्या है और उसके बाद कौन सा जीवन है? गुरू जी फिर कहा- हम नहीं बता सकते। अब तक शिष्य झल्ला चुका था। यह सोचकर कि जब गुरु जी कुछ बता ही नहीं सकते तो यहां शिक्षा प्राप्त करने से क्या लाभ? गुरू जी के अन्य शिष्यों ने उसके इस तरह से चले जाने को गुरु का अपमान समझा। कुछ ने यह भी समझ लिया कि लगता है कि हमारे गुरु जी को ज्ञान नहीं है। शिष्यों के मन में चल रही उथल-पुथल को गुरु जी भांप गए और बोले-जिस जीवन को तुमने अभी तक जीना प्रारंभ ही नहीं किया है, उसके बारे में जानकर क्या करोगे। सामने रखे भोजन के बारे में अटकल लगाने से अच्छा होगा कि उसे चखकर देख लिया जाए। ‘एक दार्शनिक अन्थोनी डिमेलो ने कहा-‘जीवन विचार से नहीं, अनुभव से मिलता है।’मोटे तौर पर जन्म से मृत्यु तक बीच की अवधि को जीवन कहते हैं। जीवन अपनी इच्छा से नहीं मिलता है। यह नर और मादा के समागम का परिणाम है जो कि प्रकृति का नियम है। जीवन का एक आवश्यक अंग चेतना है जो मनुष्य की गतिविधियों को संचालित करती है और वही उसकी साक्षी भी होती है। यही वह तत्व है जो जीवन को सार्थकता प्रदान करता है। एक दिशा प्रदान करता है। यह मनुष्य के जीवन को उद्देश्यवान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक तरह से यह जीवन के शरीर के कंप्युटर की हार्डडिस्क की तरह है।जीवन के बारे में यह कुछ बताने का अभिप्राय यह है कि आज मनुष्य की जिंदगी उलझ गई है, मनुष्य इस उलझाव में फंस गया है और उसे इस उलझाव से कैसे बाहर निकाला जाए। इस उलझाव का एक परिणाम यह है कि मनुष्य का जीवन सार्थक नहीं बन पा रहा है। वह कार्य नहीं कर पा रहा है, जो उसे करना चाहिए। करना भी चाहता है तो भटक जाता है। बहुत कुछ पाने की लालसा में उसे कुछ नहीं मिल पा रहा है। ऐसा क्यों है, इस बारे में न कोई सोचने को तैयार है और न ही कुछ ऐसा पा रहा है कि उसके जीवन को सार्थकता मिले;अब यही देखिए। एक छोटा सा उदाहरण। किसी युवक को मनचाही मंजिल न मिली तो वह खुदकुशी कर लेता है। उसे सब कुछ चाहिए लेकिन उसे पाने के लिए जो श्रम व त्याग की अपेक्षा है, वह उससे नहीं हो पाता। यहीं कुंठा जन्म लेती है। रोज ऐसी घटनाएं सुनने व देखने को मिलती हैं, जब लोग मनचाहा हासिल न कर पाने से परेशान होकर अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं। कोई पंखे से लटक जाता है, कोई ट्रेन के नीचे लेट जाता है, कोई सल्फास की गोलियां गटक जाता है, तो कोई बहुमंजिली इमारतों से छलांग लगा लेता है। तरीका कुछ भी होता है लेकिन उसका परिणाम एक ही होता है, जीवन की समाप्ति। अब तो मां-बाप बच्चों को कुछ कहते हुए डरने लगे हैं कि कहीं उनका बच्चा कुछ कर न बैठे। यह डर आज ही पैदा नहीं हुआ है। एक लम्बे समय का अंतराल बीतने के बाद फिजाओं में इस तरह की सनसनी व्याप्त हो गई है जो लोगों को जीवन की सार्थकता से दूर धकेल रही है। इसकी चपेट से बचना आसान नहीं है लेकिन कठिन भी नहीं है। पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे। घर के बड़े-बूढ़े बच्चों में समझदारी आने से पहले उन्हें जीवन के बारे में बहुत कुछ बताया करते थे; वह अकेला जीवन रहकर जीवन कैसे जिएगा, इसके लिए तैयार करते थे। उन्हें पता था कि एक दिन वह संतान को छोड़कर चले जाएंगे। उनकी संतान अकेले रह जाएगी। जीवन अकेले ही जीना पड़ेगा। इसलिए वह उसे जीवन जीने लायक बनने में मदद करते थे। अब ऐसा नहीं रहा। बच्चा चलने लायक हो गया तो उसे स्कूल भेज दिया। उनके पास समय नहीं है कि वह बच्चे को अपने पास रखकर जीवन जीने के लिए जरूरी बातें बता सकंे। अगर खुदकुशी की परिस्थितियों की बात करें तो समाज मे युग-युगांतरों से रही है। कई काबिल लोगों ने भी खुदकुशी की है लेकिन ऐसी घटनाआंे को दुर्लभ माना जाता था और उनके कारणों को तलाशा जाता था। ऐसी दुर्लभ घटनाओं के भी उदाहरण हैं। प्रसिद लेखक हेमिन्वे जिन्होंने ओल्ड मैन एंड द सी जैसा आशा का संचार करने वाला अद्भुद उपन्यास लिखा लेकिन अंत में उन्होंने भी न जाने किन तनावों अथवा अवसाद के कारण खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहे गए। उन्होंने दुनिया को राह दिखाई। रामराज की स्थापना की लेकिन न जाने कौन से ऐसे कारण रहे होंगे कि उन्होंने सरयू में जल समाधि लेकर अपना जीवन समाप्त कर लिया। यह बड़ा पेचीदा मनोविज्ञान है। लगता है कि दिनोंदिन लोग अकेले होते जा रहे हैं। अब समाज अथवा परिवार में ऐसे लोग कम होते जा रहे हैं, जो किसी के कुछ ऊंच-नीच सोचने पर कह सकें-बड़ा आया समझदार बनने, देंगे कान के नीचे खींच के एक। मानना होगा कि जीवन एक यात्रा है। हम सभी यहां के यात्री है। जो इसके यथार्थ को समझ लेता है, जीने का सही अर्थ जान लेता है, वह सफल हो जाता है। आज प्रगति के साथ-साथ जीवन और समाज में तमाम तरह की विसंगतियां आती जा रही हैं। तमाम प्रकार की बुराइयों से मनुष्य घिरता जा रहा है। परिस्थितियां कुछ ऐसी बन रही हैं कि तमाम सफल लोग भटकाव के शिकार हो रहे हैं। वह बुराइयों के शिकार आसानी से बने जा रहे हैं। इसका असर शासन सत्ता में ऊंचे बैठे लोगों पर ज्यादा दिखाई दे रहा है। इससे बचा जा सकता है। बशर्ते मनुष्य चेतना का सही इस्तेमाल करें। यह जिंदगी की सच्चाई है कि सब कुछ नष्ट हो जाने के बाद भविष्य बचा रहता है। इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए। ठोकर लगने के बाद संभलने की क्षमता समाज में ही हासिल होती है। कवि रवीन्द्र प्रभात की कुछ पंक्तियां इस संदर्भ में बड़ी मौजूं हैं- ‘हंसोगे, रोओगे, गुनगुनाओगे/जिंदगी के मायने समझ जाओगे/मिल जाएगी मोती तुम्हें भी, तब/जब समुद्र में गहरे उतर जाओगे/मां कहती है अक्ल आ जाएगी/जब किसी मोड़ पर ठोकर खाओगे।’
Jun 10, 2011
टिकैत का जाना
Jun 8, 2011
महंगाई से जनता बेदम, सरकार को नहीं गम
गोदामों में सड़ रहा है लाखों टन खाद्यान : देश की एक बड़ी आबादी को नहीं मिल रहा दो वक्त का भोजन : बाजारों पर सरकार का नियंत्रण नहीं : गालिब ने कहा था- 'ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले, निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन, बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।' आमजन पर ये पंक्तियां आज भी मौजूं हैं। आमजन जो चाहता है, वही नहीं होता। यों तो उसी की सरकार है, उसी के लिए है, उसी की बनाई हुई है, फिर भी जन अपेक्षाएं सरकारों की चौखट पर दम तोड़ रही हैं। आप कभी बाजार गये हैं? यह सवाल इसलिए कि बाजार जाने वाला ही बाजार का दर्द जान सकता है। आज सड़क से लेकर संसद तक महंगाई की चर्चा जुबां पर है, वह चाहे नेता हो या आम जन। महंगाई को लेकर देश की व्यवस्था इसलिए आरोपों के घेरे में हैं क्योंकि उसी की लापरवाही और अदूरदर्शिता के कारण चीजों के दाम आसमान छूने लगे हैं।
बाजार का रुख केवल उपलब्धता पर ही निर्भर नहीं करता, और भी कुछ कारण जुड़े हैं। बाजार से आम जन की रसोई जुड़ी हुई है। बाजार के उतार चढ़ाव के हिसाब से रसोई में भी उतार चढ़ाव चलता रहता है। आंकड़ों की बात करें तो देश के ढेर सारे नागरिक दो वक्त की रोटी के लिए भी मोहताज हैं। कभी उनकी रसोई में रोटी है तो सब्जी नहीं और चावल होता है तो दाल नहीं। इसका कारण महंगाई और अव्यवस्था दोनों हैं। अभी हाल ही में सूचनाएं आई थी कि सरकार द्वारा खरीदा गया लाखों कुन्तल गेहूं बारिश में भीगने के कारण नष्ट हो गया। इस पर राजनीतिक क्षे़त्रों में गरमा-गरमी हुई। मामला कोर्ट के संज्ञान में पहुंचा तो कोर्ट ने भी व्यवस्था को दोषी ठहराते हुए कहा कि यदि अनाज सुरक्षित नहीं रखा जा सकता तो उसे गरीबों में बंटवा क्यों नहीं देते। माना जाए तो यह टिप्पणी व्यवस्था पर बहुत बड़ा तंज है। जब देश के असंख्य नागरिकों को एक वक्त की रोटी भी नसीब न हो रही हो तो ऐसे में सरकारी खरीद और कल के लिए अनाज बचाकर रखने की सोच किस काम की है ?
बात बाजार की हो रही है। आजकल बाजार अमूमन बाजार वालों के हिसाब से चलता है। किसी भी बाजार में चले जाइये, वस्तुओं की रेट सूची नदारद ही मिलेगी। यह हालत केवल खाद्य पदार्थो में ही शामिल वस्तुओं की ही नहीं है। कपड़ा, फर्नीचर, वाहनों पर यात्री किराया जैसी सभी बातें इसमें शामिल हैं। जो रेट बाजार ने तय कर दिया, वही लागू हो जाता है, लेकिन वह भी पूरी ईमानदारी के साथ नहीं। जैसा ग्राहक मिलता हैं, उसी तरह रेट तय हो जाता है, वह व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी हैं कि एक ही बाजार में एक ही चीज के कई -कई रेट मिलते हैं। चीजों के रेट में उतार और चढ़ाव के पीछे और भी कई कारण है। इसमें मिलावट सबसे प्रमुख है। कोई भी शुद्धता की गारंटी नहीं ले सकता, वह चाहे व्यवस्था से ताल्लुक रखता हो अथवा हो अथवा वह उपभोक्ता हो। मिलावट ही वह रोग है, जिससे उपभोक्ता दो तरह से पिस रहा है। अधिक कीमत अदा करने के बावजूद किसी उपभोक्ता को शुद्ध सामग्री मिल ही जाएं, इस बात की गांरटी नहीं है। बाजार पर अकुंश लगाने के लिए जो व्यवस्था बनाई गई है, वही पूरी तरह निरंकुश है। व्यवस्था ही संदेश के घेरे में बनी रहती है। मिलावटियों के खिलाफ अभियान चलाने वाले कभी गंभीर हुए हों, याद नहीं आता।
हमारे समाज की रीत है कि घरेलू चीजों की ज्यादातर खरीदारी महिलाएं ही ज्यादातर करती हैं। उन्हें बाजार के बारे में ज्यादा पता होता है। उनकी नजर शुद्धता की पहचान करने में भी पुरूषों से ज्यादा पैनी होती है। इस कार्य में पुरूषों को फिसड्डी साबित करना हमारा मकसद नहीं है लेकिन सच्चाई यही है कि महिलाएं खरीदारी में ज्यादा निपुण होती है। संवैधानिक तौर पर देश की व्यवस्था इतनी चाक-चौबंद बनाई गई है कि यदि सब अपने-अपने मोर्चे पर ईमानदारी से डटे रहें तो गड़बड़ी का सवाल ही नहीं है, लेकिन यदि ऐसा हो जाए तो फिर अव्यवस्था शब्द को ही शब्दकोश से निकालना पड़ जाएगा। अभी जब विपक्षी दलों ने सरकार को मंहगाई के मसले पर घेरा तो सरकार परेशान हो उठी। सरकार को अपनी कुर्सी खतरें में दिखाई देने लगी। विपक्षी दलों को भोज पर बुलाकर सब कुछ मैनेज कर लिया गया।
देश की जनता को क्या सवाल पूछने का हक नहीं है कि यदि सरकार नागरिकों को तयशुदा रेट पर सामग्री नहीं दिला सकती और बाजार को नियंत्रित नहीं रख सकती तो उसे सत्ता में बने रहने का हक क्यों दिया जाए? लेकिन लगता है कोई भी राजनीतिक दल जनता की इच्छाओं से सरोकार रखता ही नहीं। इस सवाल का जबाव जनता को कौन देगा कि उसे हर चीज सुलभ क्यों नहीं हो पा रही हैं? इसके लिए जो भी तत्व जिम्मेदार हैं, उनके खिलाफ कार्रवाही करने में हीला-हवाली क्यों की जाती हैं? कभी इसी देश में सुना जाता था कि कम अथवा गलत तोलने वाले के हाथ काट लिए जाते थे। यदि कभी ऐसा होगा रहा होगा तो यह भी सच है कि उस वक्त की सरकारें आज की सरकारों से ज्यादा संवेदनशील रही होंगी। यह भी जाहिर है कि उस किस्म की सरकार को अपनी नहीं, जनता की चिंता ज्यादा रहती होगी। क्या आज? जबकि देश में जनता की, जनता के लिए सरकारें हैं तो जनता के सापेक्ष व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती ?
देश में सरकारें चलाने वाले राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी विचारधाराएं है और सभी जनता के लिए अच्छी हैं तो सवाल उठता है कि अब वह जनता की कसौटी पर भोथरी क्यों हो गई हैं? केंद्र की सत्ता में बैठे दल का दावा है कि वह देश के सभी फिरकों और पक्षों को साथ लेकर चलने मे सक्षम है तो क्या कारण है कि आज जनता की अपेक्षओं पर वह फिसड्डी साबित हो रही हैं? एक दल दावा करता है कि समाजवाद की विचारधारा उसे विरासत मे मिली है लेकिन लगता है कि वह भी समाज वाद को भूल बैठा है। एक और दल स्वयं को बहुजन समाज के हितों का पोषक होने का दावा करता है लेकिन उसके राज में आज बहुजन के हित ही भट्ठी पर चढ़ रहे हे। कोई दल हिंदू हितों का पोषक होने का दावा करता है लेकिन समाज में उनकी नीतियां भी कसौटी पर खरी नहीं उतर रही हैं। ऐसा क्यों ? दल अपनी-अपनी नीतियों ये डिगे हुए क्यों है ?
महंगाई की बात करें तो इस एजेंडे पर यूपीए नाकाम साबित हुई है। महंगाई पर आज सबसे ज्यादा असर पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतों ने डाला है। सरकार पर यह आरोप लगता ही रहता है कि उसके कई मंत्री पूंजीपति घरानों के संपर्क में रहते है इसलिए उनके खिलाफ कुछ करने का साहस उनमें नहीं है। इससे एक बात यह भी साबित होती है कि राजनीतिक स्पेस में ठंसे हुए नेताओं के बीच जनता की पक्षधर कोई जमात नहीं है, जो उसके हितों की जोरदार वकालत का सके। व्यवस्था बनाने में नौकरशाही की महत्वपूर्ण भूमिका है लेकिन नौकरशाही जनहितों की परवाह करने में नाकाम साबित हो रही है। ऐसी स्थिति में बाजार के मालिक बाजार वाले खुद ही बन बैठे हैं तो इसके लिए देश की जनता अथवा बाजार नहीं, सरकार और व्यवस्था खुद ही जिम्मेदार है। आज यह भी समझ लीजिए कि महंगाई को लेकर जनता मे जो गुस्सा है, वह किसी राजनीतिक दल के खिलाफ बागी न बना दे। आज वह छटपटा रही है। जनता की छटपटाहट दूर करने के लिए सरकार को इस बौनी व्यवस्था के खिलाफ कुछ निर्मम फैसले लेने पड़ सकते है लेकिन ऐसा करने के लिए मजबूत इच्छा शक्ति का होना जरूरी है।
बाजार का रुख केवल उपलब्धता पर ही निर्भर नहीं करता, और भी कुछ कारण जुड़े हैं। बाजार से आम जन की रसोई जुड़ी हुई है। बाजार के उतार चढ़ाव के हिसाब से रसोई में भी उतार चढ़ाव चलता रहता है। आंकड़ों की बात करें तो देश के ढेर सारे नागरिक दो वक्त की रोटी के लिए भी मोहताज हैं। कभी उनकी रसोई में रोटी है तो सब्जी नहीं और चावल होता है तो दाल नहीं। इसका कारण महंगाई और अव्यवस्था दोनों हैं। अभी हाल ही में सूचनाएं आई थी कि सरकार द्वारा खरीदा गया लाखों कुन्तल गेहूं बारिश में भीगने के कारण नष्ट हो गया। इस पर राजनीतिक क्षे़त्रों में गरमा-गरमी हुई। मामला कोर्ट के संज्ञान में पहुंचा तो कोर्ट ने भी व्यवस्था को दोषी ठहराते हुए कहा कि यदि अनाज सुरक्षित नहीं रखा जा सकता तो उसे गरीबों में बंटवा क्यों नहीं देते। माना जाए तो यह टिप्पणी व्यवस्था पर बहुत बड़ा तंज है। जब देश के असंख्य नागरिकों को एक वक्त की रोटी भी नसीब न हो रही हो तो ऐसे में सरकारी खरीद और कल के लिए अनाज बचाकर रखने की सोच किस काम की है ?
बात बाजार की हो रही है। आजकल बाजार अमूमन बाजार वालों के हिसाब से चलता है। किसी भी बाजार में चले जाइये, वस्तुओं की रेट सूची नदारद ही मिलेगी। यह हालत केवल खाद्य पदार्थो में ही शामिल वस्तुओं की ही नहीं है। कपड़ा, फर्नीचर, वाहनों पर यात्री किराया जैसी सभी बातें इसमें शामिल हैं। जो रेट बाजार ने तय कर दिया, वही लागू हो जाता है, लेकिन वह भी पूरी ईमानदारी के साथ नहीं। जैसा ग्राहक मिलता हैं, उसी तरह रेट तय हो जाता है, वह व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी हैं कि एक ही बाजार में एक ही चीज के कई -कई रेट मिलते हैं। चीजों के रेट में उतार और चढ़ाव के पीछे और भी कई कारण है। इसमें मिलावट सबसे प्रमुख है। कोई भी शुद्धता की गारंटी नहीं ले सकता, वह चाहे व्यवस्था से ताल्लुक रखता हो अथवा हो अथवा वह उपभोक्ता हो। मिलावट ही वह रोग है, जिससे उपभोक्ता दो तरह से पिस रहा है। अधिक कीमत अदा करने के बावजूद किसी उपभोक्ता को शुद्ध सामग्री मिल ही जाएं, इस बात की गांरटी नहीं है। बाजार पर अकुंश लगाने के लिए जो व्यवस्था बनाई गई है, वही पूरी तरह निरंकुश है। व्यवस्था ही संदेश के घेरे में बनी रहती है। मिलावटियों के खिलाफ अभियान चलाने वाले कभी गंभीर हुए हों, याद नहीं आता।
हमारे समाज की रीत है कि घरेलू चीजों की ज्यादातर खरीदारी महिलाएं ही ज्यादातर करती हैं। उन्हें बाजार के बारे में ज्यादा पता होता है। उनकी नजर शुद्धता की पहचान करने में भी पुरूषों से ज्यादा पैनी होती है। इस कार्य में पुरूषों को फिसड्डी साबित करना हमारा मकसद नहीं है लेकिन सच्चाई यही है कि महिलाएं खरीदारी में ज्यादा निपुण होती है। संवैधानिक तौर पर देश की व्यवस्था इतनी चाक-चौबंद बनाई गई है कि यदि सब अपने-अपने मोर्चे पर ईमानदारी से डटे रहें तो गड़बड़ी का सवाल ही नहीं है, लेकिन यदि ऐसा हो जाए तो फिर अव्यवस्था शब्द को ही शब्दकोश से निकालना पड़ जाएगा। अभी जब विपक्षी दलों ने सरकार को मंहगाई के मसले पर घेरा तो सरकार परेशान हो उठी। सरकार को अपनी कुर्सी खतरें में दिखाई देने लगी। विपक्षी दलों को भोज पर बुलाकर सब कुछ मैनेज कर लिया गया।
देश की जनता को क्या सवाल पूछने का हक नहीं है कि यदि सरकार नागरिकों को तयशुदा रेट पर सामग्री नहीं दिला सकती और बाजार को नियंत्रित नहीं रख सकती तो उसे सत्ता में बने रहने का हक क्यों दिया जाए? लेकिन लगता है कोई भी राजनीतिक दल जनता की इच्छाओं से सरोकार रखता ही नहीं। इस सवाल का जबाव जनता को कौन देगा कि उसे हर चीज सुलभ क्यों नहीं हो पा रही हैं? इसके लिए जो भी तत्व जिम्मेदार हैं, उनके खिलाफ कार्रवाही करने में हीला-हवाली क्यों की जाती हैं? कभी इसी देश में सुना जाता था कि कम अथवा गलत तोलने वाले के हाथ काट लिए जाते थे। यदि कभी ऐसा होगा रहा होगा तो यह भी सच है कि उस वक्त की सरकारें आज की सरकारों से ज्यादा संवेदनशील रही होंगी। यह भी जाहिर है कि उस किस्म की सरकार को अपनी नहीं, जनता की चिंता ज्यादा रहती होगी। क्या आज? जबकि देश में जनता की, जनता के लिए सरकारें हैं तो जनता के सापेक्ष व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती ?
देश में सरकारें चलाने वाले राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी विचारधाराएं है और सभी जनता के लिए अच्छी हैं तो सवाल उठता है कि अब वह जनता की कसौटी पर भोथरी क्यों हो गई हैं? केंद्र की सत्ता में बैठे दल का दावा है कि वह देश के सभी फिरकों और पक्षों को साथ लेकर चलने मे सक्षम है तो क्या कारण है कि आज जनता की अपेक्षओं पर वह फिसड्डी साबित हो रही हैं? एक दल दावा करता है कि समाजवाद की विचारधारा उसे विरासत मे मिली है लेकिन लगता है कि वह भी समाज वाद को भूल बैठा है। एक और दल स्वयं को बहुजन समाज के हितों का पोषक होने का दावा करता है लेकिन उसके राज में आज बहुजन के हित ही भट्ठी पर चढ़ रहे हे। कोई दल हिंदू हितों का पोषक होने का दावा करता है लेकिन समाज में उनकी नीतियां भी कसौटी पर खरी नहीं उतर रही हैं। ऐसा क्यों ? दल अपनी-अपनी नीतियों ये डिगे हुए क्यों है ?
महंगाई की बात करें तो इस एजेंडे पर यूपीए नाकाम साबित हुई है। महंगाई पर आज सबसे ज्यादा असर पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतों ने डाला है। सरकार पर यह आरोप लगता ही रहता है कि उसके कई मंत्री पूंजीपति घरानों के संपर्क में रहते है इसलिए उनके खिलाफ कुछ करने का साहस उनमें नहीं है। इससे एक बात यह भी साबित होती है कि राजनीतिक स्पेस में ठंसे हुए नेताओं के बीच जनता की पक्षधर कोई जमात नहीं है, जो उसके हितों की जोरदार वकालत का सके। व्यवस्था बनाने में नौकरशाही की महत्वपूर्ण भूमिका है लेकिन नौकरशाही जनहितों की परवाह करने में नाकाम साबित हो रही है। ऐसी स्थिति में बाजार के मालिक बाजार वाले खुद ही बन बैठे हैं तो इसके लिए देश की जनता अथवा बाजार नहीं, सरकार और व्यवस्था खुद ही जिम्मेदार है। आज यह भी समझ लीजिए कि महंगाई को लेकर जनता मे जो गुस्सा है, वह किसी राजनीतिक दल के खिलाफ बागी न बना दे। आज वह छटपटा रही है। जनता की छटपटाहट दूर करने के लिए सरकार को इस बौनी व्यवस्था के खिलाफ कुछ निर्मम फैसले लेने पड़ सकते है लेकिन ऐसा करने के लिए मजबूत इच्छा शक्ति का होना जरूरी है।
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